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न यं दु॒ध्रा वर॑न्ते॒ न स्थि॒रा मुरो॒ मदे॑ सुशि॒प्रमन्ध॑सः । य आ॒दृत्या॑ शशमा॒नाय॑ सुन्व॒ते दाता॑ जरि॒त्र उ॒क्थ्य॑म् ॥

English Transliteration

na yaṁ dudhrā varante na sthirā muro made suśipram andhasaḥ | ya ādṛtyā śaśamānāya sunvate dātā jaritra ukthyam ||

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Pad Path

न । यम् । दु॒ध्राः । वर॑न्ते । न । स्थि॒राः । मुरः॑ । मदे॑ । सु॒ऽशि॒प्रम् । अन्ध॑सः । यः । आ॒ऽदृत्य॑ । श॒श॒मा॒नाय॑ । सु॒न्व॒ते । दाता॑ । ज॒रि॒त्रे । उ॒क्थ्य॑म् ॥ ८.६६.२

Rigveda » Mandal:8» Sukta:66» Mantra:2 | Ashtak:6» Adhyay:4» Varga:48» Mantra:2 | Mandal:8» Anuvak:7» Mantra:2


SHIV SHANKAR SHARMA

इस मन्त्र को पढ़कर ईश्वर के निकट कृतज्ञता प्रकाश करे।

Word-Meaning: - मैं उपासक (पृषतीनाम्) नाना वर्णों की गौवों के (सहस्रे+अधि) एक सहस्र से अधिक अर्थात् एक सहस्र गौवों के सिवाय (हिरण्यम्+आददे) सुवर्णकोश को भी पाया हुआ हूँ। जो हिरण्य (चन्द्रम्) आनन्दप्रद है (बृहत्) महान् और (पृथु) ढेर है और (शुक्रम्) शुद्ध है ॥११॥
Connotation: - यह ऋचा यह शिक्षा देती है कि उसकी कृपा से जिसको जैसा धन प्राप्त हो, वैसा ईश्वर से निवेदन करे और अपनी कृतज्ञता प्रकाश करे। वही धन ठीक है, जो शुक्र=शुद्ध हो अर्थात् पापों से उत्पन्न न हुआ हो और चन्द्र अर्थात् आनन्दजनक हो। शुभकर्म और सुदान में लगाने से धन सुखप्रद होता है। इत्यादि ॥११॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

शशमानाय सुन्वते जरित्रे

Word-Meaning: - [१] (यं) = जिस (सुशिप्रं) = शोभन शिरस्त्राणवाले सर्वशक्तिमान् प्रभु को (दुध्राः) = दुर्धर अर्थात् बड़े-बड़े शक्तिशाली भी (न वरन्ते) = रोक नहीं सकते (स्थिरा मुर:) = स्थिर शत्रुमारक बली भी (न) = रोक नहीं पाते, वे प्रभु वे हैं (यः) = जो (अन्धसः मदे) = सोमपानजनित उल्लास में शशमानाय प्लुत गतिवाले - स्फूर्ति से कार्य करनेवाले, (सुन्वते) = यज्ञशील (उक्थ्यं) = स्तुत्य प्रभु का (जरित्रे) = स्तवन करनेवाले के लिए (आदृत्य) = आदरपूर्वक (दाता) = सब कुछ देनेवाले हैं। प्रभु इस स्तोता को सम्मान भी प्राप्त कराते हैं, धन भी।
Connotation: - भावार्थ- - प्रभु का वारण 'असुर, देव, मनुष्य' कोई भी नहीं कर पाते - 'न दुध, न स्थिर और न मुर्' । ये प्रभु सोम का रक्षण करनेवाले, अतएव उल्लासमय, शीघ्र गतिवाले यज्ञशील स्तोता को मानसहित धन प्राप्त कराते हैं।

SHIV SHANKAR SHARMA

अनेन मन्त्रेण कृतज्ञतां प्रकाशयेत्।

Word-Meaning: - अहमुपासकः। पृषतीनां=नानावर्णानां गवाम्। सहस्रे=सहस्रादपि। अधि=अधिकम्। हिरण्यं= हिरण्यकोशम्। आददे=प्राप्तोऽस्मि। अतोऽहं तं यथा प्रार्थये, तथा यूयमपि तं प्रार्थयध्वमित्यर्थः। कीदृशम्। चन्द्रमाह्लादकम्। पुनः बृहत्। पृथु। शुक्रञ्च ॥११॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Indra whom none can stop in his state of ecstasy and abundant charity, neither the impetuous, nor the constant, nor demon nor mortal, Indra who is the giver of cherished wealth and joy to the celebrant, the creator of soma and the zealous worshipper with deep reverence and homage.