Go To Mantra
Viewed 373 times

न पा॒पासो॑ मनामहे॒ नारा॑यासो॒ न जळ्ह॑वः । यदिन्न्विन्द्रं॒ वृष॑णं॒ सचा॑ सु॒ते सखा॑यं कृ॒णवा॑महै ॥

English Transliteration

na pāpāso manāmahe nārāyāso na jaḻhavaḥ | yad in nv indraṁ vṛṣaṇaṁ sacā sute sakhāyaṁ kṛṇavāmahai ||

Mantra Audio
Pad Path

न । पा॒पासः॑ । म॒ना॒म॒हे॒ । न । अरा॑यासः । न । जल्ह॑वः । यत् । इत् । नु । इन्द्र॑म् । वृष॑णम् । सचा॑ । सु॒ते । सखा॑यम् । कृ॒णवा॑महै ॥ ८.६१.११

Rigveda » Mandal:8» Sukta:61» Mantra:11 | Ashtak:6» Adhyay:4» Varga:38» Mantra:1 | Mandal:8» Anuvak:7» Mantra:11


SHIV SHANKAR SHARMA

फिर भी दान की प्रार्थना करते हैं।

Word-Meaning: - हे इन्द्र ! (त्वम्) तू (दानाय) जगत् को दान देने के लिये (पुरु) अनेक (सहस्राणि) सहस्र (यूथा) पशुओं के झुण्ड (मंहसे) रखता है (च) पुनः (शतानि) अनन्त-अनन्त सहस्र पशुयूथ तू रखता है। हे मनुष्यों ! (विप्रवचसः) विशेषरूप से प्रार्थना करते हुए और उत्तमोत्तम वचनों को धारण करनेवाले हम उपासक (पुरन्दरम्) दुष्टों के नगरों को विदीर्ण करनेवाले परमात्मा का ही (आ+चकृम) आश्रय लेते हैं। (अवसे) रक्षा और सहायता के लिये (इन्द्रम्+गायन्तः) परमात्मा का ही गान करते हुए हम उसी का आश्रय लेते हैं ॥८॥
Connotation: - हे मनुष्यों ! ईश्वर के निकट सहस्र-२ अनन्त-२ पदार्थ हैं। वह परम कृपालु है, अतः संसारिक द्रव्य के लिये भी उसी की सेवा करो। विद्वान् लोग उसी की पूजा करते हैं ॥८॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'निष्पाप उदार ज्ञानी' उपासक

Word-Meaning: - [१] (पापासः) = पापवृत्तिवाले होकर हम (न मनामहे) = प्रभु का उपासन नहीं करते। (अरायासः न) = अपानशील बनकर भी हम प्रभु का स्तवन नहीं करते। (न) = न ही (जल्हवः) = मूर्ख बनकर हम प्रभु का भजन करते हैं। [२] निष्पाप, उदार [दानशील] व ज्ञानी बनकर (यद्) = जब (इत् नु) = निश्चय से उस (वृषणं) = सुखवर्षक (इन्द्रं) = परमेश्वर्यशाली प्रभु को उपासित करते हैं तो (सुते) = इस उत्पन्न जगत् में उस इन्द्र को (सचा) = सदा साथ होनेवाला (सखायं) = मित्र (कृणवामहै) = करते हैं।
Connotation: - भावार्थ- निष्पाप, दानशील व ज्ञानी बनकर हम प्रभु का उपासन करते हैं और प्रभु को अपना मित्र बना पाते हैं।

SHIV SHANKAR SHARMA

पुनरपि दानप्रार्थना।

Word-Meaning: - हे इन्द्र ! त्वम्। दानाय=जगते दातुम्। पुरु=पुरूणि। सहस्राणि। पशूनां यूथा=यूथानि। मंहसे=रक्षसि। च पुनः। न केवलं तव परिमितं दानमस्ति किन्तु शतानि=अनन्तानि यूथानि दानाय रक्षसि। हे मनुष्याः। विप्रवचसः=विशेषप्रार्थनावन्तो विविधप्रकृष्टवचनाश्च वयम्। अवसे=रक्षणाय अनुग्रहाय च। पुरन्दरं=दुष्टानां पुरोविदारकमीशमेव। आचकृम=आश्रयामः। तमेवेन्द्रं गायन्तस्तमेवाश्रयामः ॥८॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - We are neither sinners nor uncharitable nor non- yajakas as we honour and adore Indra, generous lord of showers of grace, and win his favour as a friend in our holy acts of creation and yajna.