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अच्छा॒ हि त्वा॑ सहसः सूनो अङ्गिर॒: स्रुच॒श्चर॑न्त्यध्व॒रे । ऊ॒र्जो नपा॑तं घृ॒तके॑शमीमहे॒ऽग्निं य॒ज्ञेषु॑ पू॒र्व्यम् ॥

English Transliteration

acchā hi tvā sahasaḥ sūno aṅgiraḥ srucaś caranty adhvare | ūrjo napātaṁ ghṛtakeśam īmahe gniṁ yajñeṣu pūrvyam ||

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Pad Path

अच्छ॑ । हि । त्वा॒ । स॒ह॒सः॒ । सू॒नो॒ इति॑ । अ॒ङ्गि॒रः॒ । स्रुचः॑ । चर॑न्ति । अ॒ध्व॒रे । ऊ॒र्जः । नपा॑तम् । घृ॒तऽके॑शम् । ई॒म॒हे॒ । अ॒ग्निम् । य॒ज्ञेषु॑ । पू॒र्व्यम् ॥ ८.६०.२

Rigveda » Mandal:8» Sukta:60» Mantra:2 | Ashtak:6» Adhyay:4» Varga:32» Mantra:2 | Mandal:8» Anuvak:7» Mantra:2


HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

ऊर्जा नपातं घृतकेशम् [ईमहे]

Word-Meaning: - [१] हे (सहसः सूनो) = बल के पुञ्ज प्रभो! हे (अंगिरः) = सर्वत्र गतिवाले प्रभो! इस (अध्वरे) = जीवनयज्ञ में (स्रुचः) = [वाग् वै स्रुक् श० ६, ३.१.८] ज्ञान की वाणियाँ (हि) = निश्चय (त्वा अच्छा) = आपकी ओर (चरन्ति) = गतिवाली होती हैं। ये ज्ञान की वाणियाँ हमें आपके समीप प्राप्त कराती हैं। [२] हम (यज्ञेषु) = यज्ञों में उस प्रभु को (ईमहे) = आराधित करते हैं-स्तुत करते हैं। जो (ऊर्जः न पातं) = शक्ति को न गिरने देनेवाले हैं। (घृतकेशं) = दीप्त ज्ञान की रश्मियोंवाले हैं। (अग्निं) = अग्रणी है और (पूर्व्यम्) = पालन व पूरण करनेवालों में उत्तम हैं।
Connotation: - भावार्थ- इस जीवनयज्ञ में हम ज्ञान को प्राप्त करते हुए प्रभु का उपासन करें। प्रभु हमें शक्ति प्राप्त कराएँगे और ज्ञानदीप्ति को देंगे।

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, creator of energy and power, dear as breath of life omnipresent, the ladles of ghrta feed you well in the holy fire of yajna. We honour and adore the divine fire, prime power, infallible product of cosmic energy and rising in flames in yajnas.