वेदवाणी द्वारा बुद्धिवर्धन
Word-Meaning: - [१] (पूर्व्यं) = पालन व पूरण करने में उत्तम (मन्म) = मननीय स्तोत्र (अस्तावि) = हमारे से स्तुत होता है। हम प्रभु का विचारपूर्वक स्तवन करते हैं- यह स्तवन हमारी लक्ष्यदृष्टि को पैदा करता हुआ हमारा पूरण करता है। (इन्द्राय) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु की प्राप्ति के लिए (ब्रह्म वोचत) = ज्ञान की वाणियों का उच्चारण करो। [२] (ऋतस्य) = सत्य ज्ञान की (पूर्वी:) = सृष्टि के प्रारम्भ में दी जानेवाली (बृहती:) = ये वर्धन की हेतुभूत वाणियाँ (अनूपत) = हमारे से स्तुत होती हैं। इस वेदवाणी के स्तवन से (स्तोतुः) = स्तवन करनेवाले की (मेधाः) = बुद्धियाँ (असृक्षत) = सृष्ट होती हैं। वेदवाणियों का अध्ययन बुद्धियों की वृद्धि का कारण बनता है।
Connotation: - भावार्थ- हम प्रभु का स्तवन करें। प्रभुप्राप्ति के लिए ज्ञान की वाणियों का उच्चारण करें। ये वेदवाणियाँ हमारी बुद्धि का वर्धन करनेवाली होती हैं।