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यो मे॒ हिर॑ण्यसंदृशो॒ दश॒ राज्ञो॒ अमं॑हत । अ॒ध॒स्प॒दा इच्चै॒द्यस्य॑ कृ॒ष्टय॑श्चर्म॒म्ना अ॒भितो॒ जना॑: ॥

English Transliteration

yo me hiraṇyasaṁdṛśo daśa rājño amaṁhata | adhaspadā ic caidyasya kṛṣṭayaś carmamnā abhito janāḥ ||

Pad Path

यः । मे॒ । हिर॑ण्यऽसन्दृशः । दश॑ । राज्ञः॒ । अमं॑हत । अ॒धः॒ऽप॒दाः । इत् । चै॒द्यस्य॑ । कृ॒ष्टयः॑ । च॒र्म॒ऽम्नाः । अ॒भितः॑ । जनाः॑ ॥ ८.५.३८

Rigveda » Mandal:8» Sukta:5» Mantra:38 | Ashtak:5» Adhyay:8» Varga:8» Mantra:3 | Mandal:8» Anuvak:1» Mantra:38


SHIV SHANKAR SHARMA

इससे विवेक का वर्णन दिखलाते हैं।

Word-Meaning: - (यः) जो विवेकाख्य कशु (मे) मुझको (हिरण्यसंदृशः) जिनसे विषयों का हरण और अच्छे प्रकार ज्ञान होता है, ऐसे (दश) दश (राज्ञः) दीप्तिमान् इन्द्रियों को (अमंहत) देता है। यद्वा (हिरण्यसंदृशः) सुवर्ण के समान देदीप्यमान (दश+राज्ञः) दश राजाओं को मेरे अधीन करके (मे) मुझको (यः) जो विवेक (अमंहत) देता है, उस विवेक की अधीनता में सब हैं, यह आगे कहा जायेगा, राजाओं का विजय करना भी विवेक का ही प्रधान काम है। क्योंकर विवेक ऐसा करता है, इस पर कहते हैं−(चैद्यस्य) उस विवेक के (इत्) ही (अधस्पदाः) पैर के नीचे (कृष्टयः) सर्व मनुष्य हैं और उसी की अधीनता में (चर्मम्नाः) कवचादि धारण और अभ्यास में निपुण (जनाः) सर्वजन (अभितः) चारों ओर विद्यमान रहते हैं ॥३८॥
Connotation: - विवेक के उत्पन्न होने से इन्द्रियों का इन्द्रियत्व प्रतीत होता है। हे मनुष्यों ! विवेक के ही अधीन सब जन हैं, उसी की उपासना करो ॥३८॥

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (यः) जिस शासक ने (मे) मुझे (हिरण्यसंदृशः) हिरण्यसदृश तेजवाले (दश, राज्ञः) दश राजाओं को (अमंहत) दिया (चैद्यस्य) जिस ज्ञानयोगी के (कृष्टयः) सब शत्रु (अधस्पदाः, इत्) पैर के नीचे ही हैं (जनाः) उसके भट (अभितः) सर्वत्र (चर्मम्नाः) कवचबद्ध रहते हैं ॥३८॥
Connotation: - हे शत्रुओं को तपानेवाले, हे भटमानी योद्धाओं पर विजय प्राप्त करनेवाले ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन् ! आप तेजस्वी दश राजा मुझको दें अर्थात् दश राजाओं का मुझको शासक बनावें, जिससे मैं ऐश्वर्य्यसम्पन्न होकर अपने यज्ञ को पूर्ण करूँ, यह यजमान की ओर से उक्ति है ॥३८॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

दस राजाओं की प्राप्ति [राजा प्राण]

Word-Meaning: - [१] (यः) = जो प्रभु (मे) मेरे लिये (दश) = दस (हिरण्यसन्दृशः) = स्वर्ण के समान देदीप्यमान, तेजस्वी (राज्ञः) = जीवन को व्यवस्थित [regulated] करनेवाले, जीवन के शासक प्राणों को अमंहत देते हैं। (इत्) = निश्चय से उस (चैद्यस्य) = [चित् एव चैद्यः] सर्वज्ञ प्रभु के (कृष्टयः) = सब मनुष्य (अधस्पदाः) = पावों के नीचे हैं, अर्थात् उसके अधीन हैं, उसी के शासन में चल रहे हैं। [२] सामान्यतः (अभितः) = सब ओर (जनाः) = लोग (चर्मम्नाः) = [म्ना अभ्यासे] चर्मवेष्टित इस देह को बार-बार लेनेवाले हैं। ये देह प्रभु की कर्मव्यवस्था के अनुसार ही इन लोगों को लेने पड़ते हैं। जब कभी प्रभु का साक्षात्कार होता है, तभी यह देह बन्धन समाप्त होता है।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु हमें दश प्राणों को प्राप्त कराते हैं। वे सर्वज्ञ प्रभु सब जीवों को अपनी आधीनता में ले चल रहे हैं। जब तक प्रभु दर्शन नहीं होता, तब तक बारम्बार यह शरीर लेना ही पड़ता है।

SHIV SHANKAR SHARMA

विवेकवर्णनमाह।

Word-Meaning: - यः कशुर्विवेकः। मे=मह्यम्। हिरण्यसंदृशः=विषयान् हरन्ति ये ते हिरण्याः। यद्वा। ह्रियन्ते विषया यैस्ते हिरण्या हर्तारः। संदृश्यन्ते ज्ञायन्ते विषया यैस्ते संदृशः=सम्यग्द्रष्टारः। हिरण्याश्च ते संदृशश्चेति हिरण्यसंदृशः। दश। राज्ञः=राजन्ते शोभन्त इति राजानस्तान् इन्द्रियलक्षणान्। अमंहत=ददाति। ननु प्रागपि विवेकोत्पत्तेर्दशेन्द्रियाणि विद्यन्त एव। सत्यम्। जाते विवेक इन्द्रियाणामिन्द्रियत्वं प्रतिभातीति तथोक्तम्। यद्वा। विवेकः खलु दश दशराज्ञोऽधीनात् कृत्वा मह्यं ददाति। दशराजान इदानीं ममाधीना जाता इति विवेकस्यैव प्रतापः। ननु कथं विवेक एवं करोतीति ब्रूते−चैद्यस्य=चेदिभ्यः शिक्षितेभ्य इन्द्रियेभ्यो जातश्चैद्यो विवेकस्तस्य। इद्=एव। कृष्टयः=प्रजाः। अधस्पदाः=पादयोरधस्ताद् वर्तन्ते। पुनः। तस्य सर्वे जनाः। चर्मम्नाः=चर्ममयस्य कवचादेर्धारणे कृताभ्यासाः। अभितः=सर्वतः पराभवन्ति ॥३८॥

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (यः) यः शासकः (मे) मह्यम् (हिरण्यसंदृशः) हिरण्यसदृशदर्शनीयान् (दश, राज्ञः) दश नृपान् (अमंहत) मह्यं दत्तवान् (चैद्यस्य) ज्ञानयोगिनः (कृष्टयः) सर्वे कर्षकाः शत्रवः (अधस्पदाः, इत्) पादयोः अधस्तादेव (जनाः) तस्य भटाश्च (अभितः) सर्वत्र (चर्मम्नाः) कवचिनः ॥३८॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Similarly that ruler knew who gave me ten estates of real beauty and value like gold. All people are under control of the wise ruler and men in armour stand round in readiness to serve and obey.