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न तं ति॒ग्मं च॒न त्यजो॒ न द्रा॑सद॒भि तं गु॒रु । यस्मा॑ उ॒ शर्म॑ स॒प्रथ॒ आदि॑त्यासो॒ अरा॑ध्वमने॒हसो॑ व ऊ॒तय॑: सु॒तयो॑ व ऊ॒तय॑: ॥

English Transliteration

na taṁ tigmaṁ cana tyajo na drāsad abhi taṁ guru | yasmā u śarma sapratha ādityāso arādhvam anehaso va ūtayaḥ suūtayo va ūtayaḥ ||

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Pad Path

न । तम् । ति॒ग्मम् । च॒न । त्यजः॑ । न । द्रा॒स॒त् । अ॒भि । तम् । गु॒रु । यस्मै॑ । ऊँ॒ इति॑ । शर्म॑ । स॒ऽप्रथः॑ । आदि॑त्यासः । अरा॑ध्वम् । अ॒ने॒हसः॑ । वः॒ । ऊ॒तयः॑ । सु॒ऽऊ॒तयः॑ । वः॒ । ऊ॒तयः॑ ॥ ८.४७.७

Rigveda » Mandal:8» Sukta:47» Mantra:7 | Ashtak:6» Adhyay:4» Varga:8» Mantra:2 | Mandal:8» Anuvak:6» Mantra:7


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SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - (प्रचेतसः) परमज्ञानी वे सभासद्जन (यस्मै) जिस सज्जन को (क्षयम्) निवासार्थ गृह (च) और (जीवातुम्) जीवनसाधनोपाय (अरासत) देते हैं (घ+इत्) निश्चय (इमे+आदित्याः) ये सभासद् उस (विश्वस्य+मनोः) सर्वकृपापात्र मनुष्य के (रायः) धन के ऊपर (ईशते) अधिकारी भी रखते हैं (अनेहसः) इत्यादि पूर्ववत् ॥४॥
Connotation: - इसका आशय यह है कि सभासद् जिसको पारितोषिकरूप धनादि देवें, उसके धन के वे रक्षक भी होवें ॥४॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

क्रोध से मार्गभ्रष्ट न होना

Word-Meaning: - [१] हे (आदित्यासः) = अच्छाइयों का आदान करनेवाले देवो ! (यस्मा) = जिसके लिए आप (उ) = निश्चय से (सप्रथः) = विस्तृत (शर्म) = शरण को (अराध्वम्) = देते हो, (तं) = उस व्यक्ति को (तिग्मं चन) = बड़ा तीव्र भी (त्यजः) = क्रोध (न द्रासत्) = कुत्सित गतिवाला नहीं करता है। (तं) = उसको (गुरु) = महान् क्रोध भी (न अभि) [द्रासत् ] = कुत्सित गतिवाला नहीं करता। [२] हे आदित्यो ! (वः) = आपके (ऊतयः) = रक्षण (अनेहसः) = निष्पाप हैं। (वः) = आपके (ऊतयः) = रक्षण (सु ऊतयः) उत्तम रक्षण हैं। आपके रक्षणों से रक्षित होकर हम निष्पाप बनते हैं।
Connotation: - भावार्थ-आदित्यों से रक्षित हुआ हुआ पुरुष तीव्र व महान् क्रोध से कुत्सित गतिवाला नहीं होता । क्रोध के कारण यह कुकर्म नहीं करता ।
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SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - प्रचेतसः=प्रकृष्टप्रज्ञाः परमज्ञानिनस्ते सभासदः। यस्मै पुरुषाय। क्षयं=गृहम्। जीवातुञ्च=जीवनसाधनोपायञ्च। अरासत=ददति तस्य। विश्वस्य=सर्वस्य मनोर्मनुष्यस्य (घ+इत्) रायो धनस्य इमे आदित्या ईशते। शिष्टं व्याख्यातम् ॥४॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Sharpest envy and violent anger do not terrify or demoralise him, O Adityas, whom you give a large home and wide margin of tolerance. Sinless are your protections, noble and holy your safeguards and securities.