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यदा॒विर्यद॑पी॒च्यं१॒॑ देवा॑सो॒ अस्ति॑ दुष्कृ॒तम् । त्रि॒ते तद्विश्व॑मा॒प्त्य आ॒रे अ॒स्मद्द॑धातनाने॒हसो॑ व ऊ॒तय॑: सु॒तयो॑ व ऊ॒तय॑: ॥

English Transliteration

yad āvir yad apīcyaṁ devāso asti duṣkṛtam | trite tad viśvam āptya āre asmad dadhātanānehaso va ūtayaḥ suūtayo va ūtayaḥ ||

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Pad Path

यत् । आ॒विः । यत् । अ॒पी॒च्य॑म् । देवा॑सः । अस्ति॑ । दुः॒ऽकृ॒तम् । त्रि॒ते । तत् । विश्व॑म् । आ॒प्त्ये । आ॒रे । अ॒स्मत् । द॒धा॒त॒न॒ । अ॒ने॒हसः॑ । वः॒ । ऊ॒तयः॑ । सु॒ऽऊ॒तयः॑ । वः॒ । ऊ॒तयः॑ ॥ ८.४७.१३

Rigveda » Mandal:8» Sukta:47» Mantra:13 | Ashtak:6» Adhyay:4» Varga:9» Mantra:3 | Mandal:8» Anuvak:6» Mantra:13


SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - (देवाः) हे दुष्टों के जीतनेवाले हे विजयी सभासदो ! (यत्+शर्म) जो सुखसम्पत्ति (शरणम्) जो रक्षण (यद्+भद्रम्) जो भद्र (यद्+अनातुरम्) जो रोगरहित वस्तु (त्रिधातु) तीन प्रकार के धातु (यद्+वरूथ्यम्) गृहोचित उपकरण जगत् में हैं, (तत्) उस सबको (अस्मासु) हम प्रजाजनों में (वि+यन्तन) स्थापित कीजिये ॥१०॥
Connotation: - राज्यसम्बन्धी कर्मचारियों, सभासदों, प्रतिनिधियों तथा अन्यान्य पुरुषों को उचित है कि सब प्रकार अपने देश को परम समृद्ध बनाने की चेष्टा करें ॥१०॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

यद् आविः, यद् अपीच्यम्

Word-Meaning: - [१] (यद्) = जो भी (आविः) = प्रकट पाप है और (यद् अपीच्यम्) = जो अन्तहत (दुष्कृतं अस्ति) = पाप है, हे (देवासः) = देवो ! (तद्) = उस (विश्वं) = सब पाप को (त्रिते) = काम, क्रोध, लोभ को तैरनेवाले आप्तये प्रभु प्राप्ति में उत्तम पुरुषों की अधीनता में रहनेवाले (अस्मद्) = हम लोगों से (आरे दधातन) = दूर स्थापित करिये। त्रितों व आप्त्यों के सम्पर्क में रहते हुए हम पापों से सदा दूर रहें। [२] हे देवो ! (वः ऊतयः) = आपके रक्षण (अनेहसः) = निष्पाप हैं। (वः ऊतयः) = आपके रक्षण (सु ऊतयः) = उत्तम रक्षण हैं।
Connotation: - भावार्थ:-त्रित आप्त्य लोगों के सम्पर्क में हम अपने जीवनों को निष्पाप बनाएँ।

SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - हे देवाः=विजिगीषवो मनुष्याः ! यत् शर्म=यत् शरणम्। यद् भद्रं=कल्याणम्। यद् अनातुरम्=रोगरहितं वस्तु। यत् त्रिधातु। यद् वरूथ्यम्=गृहोचितम्। तत्सर्वमस्मासु। वि यन्तन=स्थापयत ॥१०॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O brilliant leaders of the world, all evil thoughts, deeds or practices, whether open or covert, which may be prevalent in the three spheres of body, mind and soul of the individual and society, all those, pray, ward off, keep away from us. Sinless are your protections, noble your safeguards.