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यो म॑ इ॒मं चि॑दु॒ त्मनाम॑न्दच्चि॒त्रं दा॒वने॑ । अ॒र॒ट्वे अक्षे॒ नहु॑षे सु॒कृत्व॑नि सु॒कृत्त॑राय सु॒क्रतु॑: ॥

English Transliteration

yo ma imaṁ cid u tmanāmandac citraṁ dāvane | araṭve akṣe nahuṣe sukṛtvani sukṛttarāya sukratuḥ ||

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Pad Path

यः । मे॒ । इ॒मम् । चि॒त् । ऊँ॒ इति॑ । त्मना॑ । अम॑न्दत् । चि॒त्रम् । दा॒वने॑ । अ॒र॒ट्वे । अक्षे॑ । नहु॑षे । सु॒ऽकृत्व॑नि । सु॒कृत्ऽत॑राय । सु॒ऽक्रतुः॑ ॥ ८.४६.२७

Rigveda » Mandal:8» Sukta:46» Mantra:27 | Ashtak:6» Adhyay:4» Varga:6» Mantra:2 | Mandal:8» Anuvak:6» Mantra:27


SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - हे मनुष्यों ! (पृथुश्रवसः) महामहा कीर्ति (कानीतस्य) कमनीय (सुराधसः) परम धनाढ्य उस ईश्वर के (दानासः) दान अनेक और अनन्त हैं। मुझको (हिरण्ययं+रथम्) सुवर्णमय रथ (ददत्) देता हुआ (मंहिष्ठः) परमपूज्य होता है। हे मनुष्यों ! वह (सूरिः) सब प्रकार के धन का प्रेरक है (वर्षिष्ठम्+श्रवः+अकृत) उपासकों के महान् यश को वह फैलाता है ॥२४॥
Connotation: - ईश्वर से लोग याचना करते हैं, परन्तु उसके दान लोग नहीं जानते हैं, उसकी कृपा और दान अनन्त है, वह सुवर्णमय रथ देता है, जो शरीर है, इससे जीव सब कुछ प्राप्त कर सकता है, उसको धन्यवाद दो ॥२४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सुकृत्तराय सुक्रतुः

Word-Meaning: - [१] (यः) = जो प्रभु (मे) = मेरे लिए (चिद् उ) = निश्चय से (इमं) = इस (चित्रं) = ज्ञानप्रद धन को (दावने) = देने के लिए (त्मना) = स्वयं (अमन्दत्) = आनन्द का अनुभव करता है। वे प्रभु (अरट्वे) = न रोनेवाले, (अ-क्षे) = न क्षीण होनेवाले, (नहुषे) = अपने को औरों से बाँधनेवाले [नह बन्धने] (सुकृत्वनि) = उत्तमता से कर्तव्य कर्मों को करनेवाले पुरुषों में (सुकृत्तराय) = शोभनकर्मों को करनेवाले के लिए (सुक्रतुः) = उत्तम प्रज्ञान व शक्तिवाला होता है। [२] प्रभु हमारे लिए ज्ञानप्रद धन को देते हुए आनन्दित होते हैं। हम संसार में रोयें नहीं, क्षीणशक्ति न हो जाएँ, औरों के साथ अपने को बाँधकर चलें, उत्तम कर्तव्य कर्मों को करनेवाले बनें। सुकृत्तर बनें- पुण्य कर्म करनेवाले बनें। प्रभु हमें शक्ति देंगे।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु हमारे लिए ज्ञानरूप धन को देते हैं। हम शोभनकर्मों में प्रवृत्त होंगे तो प्रभु से शक्ति व प्रज्ञान को प्राप्त करेंगे।

SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - पृथुश्रवसः=महामहाकीर्ते। कानीतस्य=कमनीयस्य। सुराधसः=परमधन=सम्पन्नस्य ईश्वरस्य। दानासः= दानानि=बहूनि सन्तीति मनुष्यैर्बोध्यम्। स चेश्वरः। मह्यम्। हिरण्ययं=सुवर्णमयम्। रथम्। ददत्। मंहिष्ठः=पूज्यो भवति। हे मनुष्याः स सूरिः=धनानां प्रेरकोऽस्ति। पुनः। स वर्षिष्ठमतिशयेन प्रवृद्धम्। श्रवो यशः। लोकेषु। अकृत=करोति ॥२४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - He who by himself rejoices in giving me this wonderful gift of light and yajnic expansion, the same lord of holy action rejoices in giving more to enhance higher charity of the grown up man of holy deeds in practical life.