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य ऋ॒ष्वः श्रा॑व॒यत्स॑खा॒ विश्वेत्स वे॑द॒ जनि॑मा पुरुष्टु॒तः । तं विश्वे॒ मानु॑षा यु॒गेन्द्रं॑ हवन्ते तवि॒षं य॒तस्रु॑चः ॥

English Transliteration

ya ṛṣvaḥ śrāvayatsakhā viśvet sa veda janimā puruṣṭutaḥ | taṁ viśve mānuṣā yugendraṁ havante taviṣaṁ yatasrucaḥ ||

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Pad Path

यः । ऋ॒ष्वः । श्र॒व॒यत्ऽस॑खा । विश्वा॑ । इत् । सः । वे॒द॒ । जनि॑म । पु॒रु॒ऽस्तु॒तः । तम् । विश्वे॑ । मानु॑षा । यु॒गा । इन्द्र॑म् । ह॒व॒न्ते॒ । त॒वि॒षम् । य॒तऽस्रु॑चः ॥ ८.४६.१२

Rigveda » Mandal:8» Sukta:46» Mantra:12 | Ashtak:6» Adhyay:4» Varga:3» Mantra:2 | Mandal:8» Anuvak:6» Mantra:12


SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - (विश्ववार) हे सर्वजनवरणीय सर्वश्रेष्ठ इन्द्र ! जिस तेरा (यः) जो आनन्द (दुस्तरः) दुस्तर (श्रवाय्यः) सुनने योग्य और (वाजेषु+तरुता+अस्ति) संग्रामों में पार उतारनेवाला है, (सः) वह तू (नः) हमारे (सवना) प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल के तीनों यज्ञों में (आगहि) आ और हम लोग (गोमति+व्रजे) गोसंयुक्त स्थान में अथवा आनन्दमय प्रदेश में (गमेम) प्राप्त होवें ॥९॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

श्रावयत्सखा

Word-Meaning: - [१] (यः) = जो प्रभु (ऋष्वः) = दर्शनीय- सुन्दर-ही- सुन्दर हैं, (श्रावयत्सखा) = अपने मित्र बननेवालों को ज्ञान को सुनानेवाले हैं। (सः) = वे (पुरुष्टुतः) = बहुतों से स्तुति किये गये प्रभु (विश्वा इत्) = सब ही (जनिमा) = उत्पन्न होनेवालों को (वेद) = जानते हैं। [२] (तं) = उस (इन्द्रं) = परमैश्वर्यशाली (तविषं) = अतिशयेन बलवान् प्रभु को (विश्वे) = सब (यतस्त्रुचः) = संयत वाणीवाले पुरुष (मानुषा युगा) = मानव युगों में, अर्थात् सब कालों में (हवन्ते) = पुकारते हैं।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु दर्शनीय-ज्ञान देनेवाले व सर्वज्ञ हैं। वाणी का संयम करनेवाले सभी पुरुष उस प्रभु का सदा आराधन करते हैं।

SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - हे विश्ववारः ! सर्ववरणीय इन्द्र ! यस्ते मदः। दुस्तरः। श्रवाय्यः=श्रोतुं योग्यः। वाजेषु=संग्रामेषु। तरुता= तारकोऽस्ति। हे शविष्ठ ! अतिशय बलवन् ! हे वसो वासक ! देव ! स त्वम्। नोऽस्माकम्। सवना=सवनानि। आगहि=आगच्छ। तव कृपया वयञ्च। गोमति=गोभिर्युक्ते। व्रजे। गमेम=गच्छेम। गोमन्तं व्रजं गच्छेमेत्यर्थः ॥९॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - The lord sublime who is universally worshipped is a friend and promoter of the celebrants and knows the origins of the entire forms of existence. That same lord illustrious and refulgent, Indra, the entire people of the world with ladlefuls of ghrta in hand always invoke, adore and worship.