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यः कृ॒न्तदिद्वि यो॒न्यं त्रि॒शोका॑य गि॒रिं पृ॒थुम् । गोभ्यो॑ गा॒तुं निरे॑तवे ॥
English Transliteration
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yaḥ kṛntad id vi yonyaṁ triśokāya girim pṛthum | gobhyo gātuṁ niretave ||
Pad Path
यः । कृ॒न्तत् । इत् । वि । यो॒न्यम् । त्रि॒ऽशोका॑य । गि॒रिम् । पृ॒थुम् । गोऽभ्यः॑ । गा॒तुम् । निःऽए॑तवे ॥ ८.४५.३०
Rigveda » Mandal:8» Sukta:45» Mantra:30
| Ashtak:6» Adhyay:3» Varga:47» Mantra:5
| Mandal:8» Anuvak:6» Mantra:30
SHIV SHANKAR SHARMA
Word-Meaning: - परमात्मा (तुर्वशे) शीघ्र वश में होनेवाले सरल स्वभावी (यदौ) मनुष्य में (अह्ववाय्यम्) प्रतिदिन किए हुए (तत्+सत्यम्) उस सत्य को (विदानः) पाकर उसके लिये (तुर्वणे) इस संसार-संग्राम में (शमि) कल्याण का मार्ग (व्यानट्) फैलाता है ॥२७॥
Connotation: - ईश्वर जिसमें सत्यता पाता है, उसके लिये मङ्गलमय मार्ग खोलता है, अतः हे मनुष्यों ! प्रतिदिन सत्यता की ओर जाओ। असत्यता में फँसकर अपने को मत पतित बनाओ ॥२७॥
HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
योन्यं 'गिरिम्'
Word-Meaning: - [१] शरीर में नाड़ियाँ ' नदियाँ' हैं तो अस्थियाँ 'पर्वत' । रीढ़ ही हड्डी मेरुदण्ड व मेरुपर्वत है। यह विशाल पर्वत है- अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पर्वत है। इसमें 'इडा पिंगला, सुषुम्णा' इन तीन नाड़ियों का स्थान है। इनमें 'इडा' ही गंगा है, 'पिंगला' यमुना तथा 'सुषुम्णा' सरस्वती है। प्राणसाधना द्वारा सुषुम्णा का जागरण होता है (यः) = जो भी (योन्यं) = शरीररूप योनि व गृह में होनेवाले (पृथुं गिरिं) = इस विशाल मेरुदण्ड रूप पर्वत को (इत्) = निश्चय से (विकृन्तत्) = छिन्न करता है, अर्थात् (सुषुम्णा) = के द्वार को खोलता है वह (त्रिशोकाय) = तीनों दीप्तियों के लिये होता है- यह शरीर, मन व बुद्धि तीनों को दीप्त करता है। [२] यह साधक ही (गोभ्यः) = ज्ञान की वाणियों के (निरेतवे) = निश्चय से प्राप्त होने के लिए (गातुम्) = मार्ग को बनाते हैं। इस प्राणसाधना से ज्ञान का निश्चय से वर्धन होता है।
Connotation: - भावार्थ- हम शरीरस्थ मेरुदण्डरूप मेरुपर्वत में स्थित इडा, पिंगला व सुषुम्णा आदि नाड़ियों के द्वारों को प्राणसाधना द्वारा खोलें और ज्ञान की वाणियों की प्राप्ति के लिए मार्ग को तैयार करें।
SHIV SHANKAR SHARMA
Word-Meaning: - परमात्मा ! तुर्वशे=तूर्णवशे, शीघ्रवशीभूते। यदौ=मनुष्ये। अह्ववाय्यम्=प्रतिदिनसंतानीयम्=प्रतिदिनकृतमित्यर्थः तत् सत्यम्। विदानः=प्राप्नुवन्=जानत् वा तदर्थम्। तुर्वणे=संसारक्षेत्रे। शमि=कल्याणम्। व्यानट्=विस्तारयति ॥२७॥
DR. TULSI RAM
Word-Meaning: - I adore Indra who makes and breaks the cloud, womb of waters, and the mighty mountain for the humanity of threefold purity of nature, character and behaviour and who makes the paths for rivers to flow on earth.
