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या वृ॑त्र॒हा प॑रा॒वति॒ सना॒ नवा॑ च चुच्यु॒वे । ता सं॒सत्सु॒ प्र वो॑चत ॥

English Transliteration

yā vṛtrahā parāvati sanā navā ca cucyuve | tā saṁsatsu pra vocata ||

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Pad Path

या । वृ॒त्र॒ऽहा । प॒रा॒ऽवति॑ । सना॑ । नवा॑ । च॒ । चु॒च्यु॒वे । ता । सं॒सत्ऽसु॑ । प्र । वो॒च॒त॒ ॥ ८.४५.२५

Rigveda » Mandal:8» Sukta:45» Mantra:25 | Ashtak:6» Adhyay:3» Varga:46» Mantra:5 | Mandal:8» Anuvak:6» Mantra:25


SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - (वृषभ) हे उपासकों को अभीष्ट देनेवाले देव ! (त्वाम्+अभि) आपके उद्देश से अर्थात् आपकी प्रसन्नता के लिये (सुते) इस प्रस्तुत यज्ञक्रिया में (पीतये) मनुष्यों के पान और भोग के लिये (सुतम्) सोमयुक्त विविध पदार्थ (सृजामि) देता हूँ। हे इन्द्र ! (तृम्प) उनको आप तृप्त करें और (मदम्) उनके आनन्द को (व्यश्नुहि) बढ़ावें ॥२२॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

ज्ञान की ही चर्चा

Word-Meaning: - [१] (वृत्रहा) = सब ज्ञान की आवरणभूत वासनाओं को नष्ट करनेवाले प्रभु (परावति) = आज से कितने ही सुदूर काल में (या सना) = जिन सनातन परन्तु (च) = फिर भी (नवा) = इन नवीन ज्ञान की वाणियों को (चुच्युवे) = प्रेरित करते हैं। (ता) = उन ज्ञान की वाणियों को (संसत्सु) = सभाओं में (प्रवोचत) = प्रकर्षेण उच्चरित करो। [२] हम जब भी एकत्रित हों परस्पर ज्ञान की ही चर्चा करें। यह ज्ञान की चर्चा ही हमें पवित्र करेगी। यही हमें सोमरक्षण के योग्य बनाएगी।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु सदा से जिन ज्ञानवाणियों की प्रेरणा देते आए हैं, हम मिलने पर उन्हीं का प्रवचन करें। यह ज्ञान में विचरना ही हमें वासना का शिकार होने से बचाएगा।

SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - हे वृषभ ! उपासकानामभीष्टवर्षाकारिन् इन्द्र ! त्वामभि=त्वामुद्दिश्य। अहमुपासकः। सुते=प्रस्तुते यज्ञे। सुतं=विविधं वस्तु। पीतये=मनुष्याणां पीतये। सृजामि=त्यजामि। हे देव। तृम्प=तान् तर्पय। तेषां मदमानन्दञ्च। व्यश्नुहि=विस्तारय च ॥२२॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Whatever gifts of wealth or titles of honour old or new, Indra, destroyer of evil and darkness, you grant far off or near, all those, announce in the assemblies.