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जु॒षा॒णो अ॑ङ्गिरस्तमे॒मा ह॒व्यान्या॑नु॒षक् । अग्ने॑ य॒ज्ञं न॑य ऋतु॒था ॥

English Transliteration

juṣāṇo aṅgirastamemā havyāny ānuṣak | agne yajñaṁ naya ṛtuthā ||

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Pad Path

जु॒षा॒णः । अ॒ङ्गि॒रः॒ऽत॒म॒ । इ॒मा । ह॒व्यानि॑ । आ॒नु॒षक् । अग्ने॑ । य॒ज्ञम् । न॒य॒ । ऋ॒तु॒ऽथा ॥ ८.४४.८

Rigveda » Mandal:8» Sukta:44» Mantra:8 | Ashtak:6» Adhyay:3» Varga:37» Mantra:3 | Mandal:8» Anuvak:6» Mantra:8


SHIV SHANKAR SHARMA

मनुष्य के सर्व कर्म उसकी प्रीति के लिये हों, यह इससे सिखलाते हैं।

Word-Meaning: - (हर्यत) हे भक्तजनों के मङ्गलाभिलाषिन् ! (अग्ने) परमदेव ! (घृताचीः) घृतसंयुक्त (मम) मेरे (जुह्वः) जुहू स्रुवा उपभृति आदि हवनोपकरण भी (त्वा) आपकी प्रीति के लिये (उप+यन्तु) होवें। हे ईश ! (नः) हमारे (हव्या) स्तोत्रों को तू (जुषस्व) ग्रहण कर ॥५॥
Connotation: - हे मनुष्यों ! तुम वैसे शुद्ध कर्म करो, जिससे परमात्मा प्रसन्न हो ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

निरन्तर हव्य पदार्थों का सेवन

Word-Meaning: - हे (अंगिरस्तम) = प्राणों के प्राण (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! (इमा) = इन (हव्यानि) = हव्य पदार्थों का पवित्र सात्त्विक पदार्थों का (आनुषक्) = निरन्तर (जुषाणः) = सेवन कराते हुए आप (ऋतुथा) = ऋतु के अनुसार (यज्ञं नय) = हमारे जीवनयज्ञ को आगे और आगे ले चलनेवाले होइए ।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु की प्रेरणा से हम सदा सात्त्विक पदार्थों का सेवन करनेवाले बनें। यह सात्त्विक पदार्थों को सेवन ही हमारे जीवनयज्ञ की पूत का साधन होगा।

SHIV SHANKAR SHARMA

मनुष्यस्य सर्वाणि कर्माणि तत्प्रीत्यै भवन्त्विति शिक्षते।

Word-Meaning: - हे हर्यत=भक्तजनान् कामयमान ! अग्ने=सर्वशक्ते ईश ! घृताचीः=घृतमञ्चन्त्यः। मम। जुह्वः=जुहूप्रभृतीनि पूजोपकरणानि। त्वा=त्वाम्। उपयन्तु=प्राप्नुवन्तु। तवैव प्रीत्यर्थं तानि वस्तूनि भवन्त्वित्यर्थः। हे अग्ने ! नोऽस्माकम्। हव्या=हव्यानि स्तोत्राणि। त्वं जुषस्व=गृहाण ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, dearest life of life, constantly loving and cherishing the sweets of celebration and yajna, pray guide and extend the yajna according to the seasons.