प्रभु आत्मा हों, हम प्रभु के शरीर
Word-Meaning: - [१] (अग्निः) = वे अग्रणी प्रभु (प्रत्नेन मन्मना) = सनातन वेदरूप ज्ञानज्योति से (स्वाम् तन्वम्) = अपने शरीरभूत इस जीव को (शुम्भानः) = शोभित करते हैं। हमारे अन्दर प्रभु का वास है। सो हम प्रभु के शरीररूप हैं। प्रभु इस शरीर को सनातन ज्ञानज्योति से सुशोभित करते हैं। जो भी प्रभु का शरीर बनेगा, वह ज्ञानज्योति से दीप्त जीवनवाला बनेगा। [२] ये (कविः) = क्रान्तदर्शी - सर्वज्ञ प्रभु विप्रेण ज्ञानी पुरुष से (वावृधे) = स्तुतियों के द्वारा बढ़ाए जाते हैं। प्रभु का स्तवन करता हुआ यह ज्ञानी अपने अन्दर प्रभु की दिव्यता को धारण करता है। यही प्रभु का वर्धन है।
Connotation: - भावार्थ- हम अपने अन्दर प्रभु को बिठावें । प्रभु हमें ज्ञानदीप्त बनाएँगे। इस प्रकार हमें दिव्यता प्राप्त होगी।