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यथा॑ वा॒मत्रि॑रश्विना गी॒र्भिर्विप्रो॒ अजो॑हवीत् । नास॑त्या॒ सोम॑पीतये॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

English Transliteration

yathā vām atrir aśvinā gīrbhir vipro ajohavīt | nāsatyā somapītaye nabhantām anyake same ||

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Pad Path

यथा॑ । वा॒म् । अत्रिः॑ । अ॒श्वि॒ना॒ । गीः॒ऽभिः । विप्रः॑ । अजो॑हवीत् । नास॑त्या । सोम॑ऽपीतये । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४२.५

Rigveda » Mandal:8» Sukta:42» Mantra:5 | Ashtak:6» Adhyay:3» Varga:28» Mantra:5 | Mandal:8» Anuvak:5» Mantra:5


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SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - हे मनुष्यगण ! आप (बृहन्तम्) महान् (वरुणम्) वरणीय परमात्मा की (वन्दस्व) वन्दना करें। पुनः (धीरम्) सर्ववित् (अमृतस्य) अमृत=युक्ति का (गोपाम्) रक्षक उसी वरुण-वाच्य ईश्वर को (नमस्य) नमस्कार करो (सः) वह इस प्रकार पूजित हो (नः) हमको (त्रिवरूथम्) त्रिभूमिक अथवा त्रिलोकवरणीय (शर्म) गृह कल्याण और मङ्गल (वि+यंसत्) देवे। (द्यावापृथिवी) हे द्यावापृथिवी ! (उपस्थे) आपके क्रोड़ में वर्तमान हम उपासकों को (पातम्) निखिल उपद्रवों से बचावें ॥२॥
Connotation: - जो ईश्वर की पूजा और वन्दना करते हैं, उनकी सब ही पदार्थ रक्षा करते हैं। अतः हे मनुष्यों केवल उसी की पूजा करो। यदि अपनी रक्षा चाहते हो ॥२॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

मत्रिः

Word-Meaning: - [१] हे अश्विना प्राणापानो! यथा- जिस प्रकार विप्रः - ज्ञानी अत्रिः - काम-क्रोध व लोभ से ऊपर उठा हुआ अत्रि गीर्भिः = स्तुतिवाणियों के द्वारा वाम्= आपको अजोहवीत् पुकारता है, उसी प्रकार मैं भी आपका आराधन करता हूँ। [२] हे नासत्या - सब असत्यों को दूर करनेवाले प्राणापानो! आप सोमपीतये शरीर में सोम के [ वीर्यशक्ति के] रक्षण के लिए होते हैं। आपकी साधना से (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ।
Connotation: - भावार्थ- हम काम-क्रोध लोभ से ऊपर उठकर प्राणसाधना में प्रवृत्त हों। यह साधना ही सोम रक्षण द्वारा हमारे शत्रुओं का शातन करेगी।
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SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - हे मनुष्यगण ! बृहन्तं=महान्तम्। वरुणमेव। वन्दस्व। पुनः। धीरं। अमृतस्य। गोपां=गोपायितारं रक्षितारम्। तमेव। नमस्य=नमस्कुरु। स ईदृगीश्वरः। नोऽस्मभ्यम्। त्रिवरूथं=त्रिभूमिकं। शर्म=गृहम्। वियंसत्=विशेषेण यच्छतु। हे द्यावापृथिवी ! युवयोः। उपस्थे=क्रोडे वर्तमानान्। नोऽस्मान्। पातं रक्षतम् ॥२॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Ashvins, powers dedicated to truth and rectitude, as the vibrant sage, who loves and values threefold freedom of body, mind and soul, calls upon you in holy words of freedom and discipline for the protection and promotion of the honour, excellence and joy of life, pray see that all fear, insecurity and adversities are eliminated.