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स स॑मु॒द्रो अ॑पी॒च्य॑स्तु॒रो द्यामि॑व रोहति॒ नि यदा॑सु॒ यजु॑र्द॒धे । स मा॒या अ॒र्चिना॑ प॒दास्तृ॑णा॒न्नाक॒मारु॑ह॒न्नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

English Transliteration

sa samudro apīcyas turo dyām iva rohati ni yad āsu yajur dadhe | sa māyā arcinā padāstṛṇān nākam āruhan nabhantām anyake same ||

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Pad Path

सः । स॒मु॒द्रः । अ॒पी॒च्यः॑ । तु॒रः । द्याम्ऽइ॑व । रो॒ह॒ति॒ । नि । यत् । आ॒सु॒ । यजुः॑ । द॒धे । सः । मा॒याः । अ॒र्चिना॑ । प॒दा । अस्तृ॑णात् । नाक॑म् । आ । अ॒रु॒ह॒त् । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४१.८

Rigveda » Mandal:8» Sukta:41» Mantra:8 | Ashtak:6» Adhyay:3» Varga:27» Mantra:3 | Mandal:8» Anuvak:5» Mantra:8


SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - (यः) जो वरुण (भुवनानाम्) सम्पूर्ण सूर्य्यादि जगत् और समस्त प्राणियों का (धर्ता) धारण करनेवाला है और (उस्राणाम्) सूर्य्य की किरणों का भी वही धाता विधाता है और (अपीच्या) अन्तर्हित=भीतर छिपे हुए (गुह्या) गोपनीय (नामानि) नामों को भी (वेद) जानता है। (सः+कविः) वह महाकवि है और वह (काव्या) काव्यों को (पुरु) बहुत बनाकर (पुष्यति) पुष्ट करता है। (इव) जैसे (द्यौः) सूर्य्य (रूपम्) रूप को पुष्ट करता है, तद्वत् ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

समुद्रः-अपीच्यः-तुरः

Word-Meaning: - (१) (स:) = वे प्रभु (समुद्र:) = (स+मुद्) सदा आनन्द के साथ हैं- आनन्दस्वरूप हैं। (अपीच्य:) = सबके अन्दर हैं-छिपे रूप में विद्यमान हैं। (तुरः) = सब बुराइयों का संहार करनेवाले हैं। जब एक उपासक प्रभु का इस रूप में उपासन करता है, तो वह भी आनन्द को प्राप्त करता है, सदा अन्दर स्थित होने का प्रयत्न करता है, बहिर्मुखी वृत्तिवाला नहीं होता और काम-क्रोध आदि का संहार करनेवाला होता है। इस उपासक के हृदयान्तरिक्ष में वे प्रभु इस प्रकार (रोहति) = प्रादुर्भूत होते हैं, (इव) = जैसे (द्याम्) = द्युलोक में सूर्य का प्रादुर्भाव होता है। सूर्योदय हुआ और अन्धकार समाप्त हुआ, इसी प्रकार प्रभु का प्रादुर्भाव होते ही सब वासनान्धकार विलीन हो जाता है। यह वह समय होता हैं (यद्) = जब (आसु) = इन प्रजाओं में वे प्रभु (यजुः निदधे) = यज्ञात्मक कर्मों को स्थापित करते हैं। वे उपासक अपने लिए न जी कर औरों के लिए जीते हैं। (२) (सः) = वह प्रभु का उपासक (अर्चिना) = उपासना के द्वारा तथा (पदाः) = [पद गतौ] गतिशीलता के द्वारा (माया अस्तृणात्) = मायाओं को हिंसित करता है। प्रभुस्मरण पूर्वक कर्मों को करता हुआ प्रकृति की माया से आकृष्ट नहीं होता । वह प्राकृतिक माया इस उपासक को वशीभूत नहीं कर पाती । माया को तैरकर यह (नाकम् अरुहत्) = मोक्षलोक में आरोहण करता है। इस प्रभुस्मरण के द्वारा हमारे (समे) = सारे (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ।
Connotation: - भावार्थ- हम आनन्दमय-अन्तहत-वासनासंहारक प्रभु का स्मरण करें। प्रभुरूप सूर्य के उदय होते ही सारा वासनान्धकार विलीन हो जाएगा। प्रभुप्रेरणा से हमारा जीवन यज्ञशील बनेगा। उपासना व क्रियाशीलता के द्वारा सब माया को तैर कर हम मोक्ष को प्राप्त करेंगे।

SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - यो वरुणः। भुवनानाम्। धर्ता=धारयिताऽस्ति। यः। उस्राणां=सूर्य्यकिरणानामपि। धर्तास्ति। यः। अपीच्या=अपीच्यानि=अन्तर्हितानि। गुह्या=गुह्यानि। नामानि। वेद=जानाति। सः। कविः। सः। काव्या=काव्यानि। पुरु=पुरूणि=बहूनि। द्यौः=सूर्य्यः। रूपमिव। पुष्यति। अन्यद् व्याख्यातम् ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - He is the bottomless ocean womb of existence, and at the heart of everything, superfast, instant reacher, like the light of heaven all expansive, and when he vests these people with the spirit of action rising to the heights of heaven, he dispels evil and craftiness with the touch of divine refulgence. May all darkness, evil and enmity be eliminated from life.