Word-Meaning: - (१) (स:) = वे प्रभु (समुद्र:) = (स+मुद्) सदा आनन्द के साथ हैं- आनन्दस्वरूप हैं। (अपीच्य:) = सबके अन्दर हैं-छिपे रूप में विद्यमान हैं। (तुरः) = सब बुराइयों का संहार करनेवाले हैं। जब एक उपासक प्रभु का इस रूप में उपासन करता है, तो वह भी आनन्द को प्राप्त करता है, सदा अन्दर स्थित होने का प्रयत्न करता है, बहिर्मुखी वृत्तिवाला नहीं होता और काम-क्रोध आदि का संहार करनेवाला होता है। इस उपासक के हृदयान्तरिक्ष में वे प्रभु इस प्रकार (रोहति) = प्रादुर्भूत होते हैं, (इव) = जैसे (द्याम्) = द्युलोक में सूर्य का प्रादुर्भाव होता है। सूर्योदय हुआ और अन्धकार समाप्त हुआ, इसी प्रकार प्रभु का प्रादुर्भाव होते ही सब वासनान्धकार विलीन हो जाता है। यह वह समय होता हैं (यद्) = जब (आसु) = इन प्रजाओं में वे प्रभु (यजुः निदधे) = यज्ञात्मक कर्मों को स्थापित करते हैं। वे उपासक अपने लिए न जी कर औरों के लिए जीते हैं। (२) (सः) = वह प्रभु का उपासक (अर्चिना) = उपासना के द्वारा तथा (पदाः) = [पद गतौ] गतिशीलता के द्वारा (माया अस्तृणात्) = मायाओं को हिंसित करता है। प्रभुस्मरण पूर्वक कर्मों को करता हुआ प्रकृति की माया से आकृष्ट नहीं होता । वह प्राकृतिक माया इस उपासक को वशीभूत नहीं कर पाती । माया को तैरकर यह (नाकम् अरुहत्) = मोक्षलोक में आरोहण करता है। इस प्रभुस्मरण के द्वारा हमारे (समे) = सारे (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ।
Connotation: - भावार्थ- हम आनन्दमय-अन्तहत-वासनासंहारक प्रभु का स्मरण करें। प्रभुरूप सूर्य के उदय होते ही सारा वासनान्धकार विलीन हो जाएगा। प्रभुप्रेरणा से हमारा जीवन यज्ञशील बनेगा। उपासना व क्रियाशीलता के द्वारा सब माया को तैर कर हम मोक्ष को प्राप्त करेंगे।