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न॒हि वां॑ व॒व्रया॑म॒हेऽथेन्द्र॒मिद्य॑जामहे॒ शवि॑ष्ठं नृ॒णां नर॑म् । स न॑: क॒दा चि॒दर्व॑ता॒ गम॒दा वाज॑सातये॒ गम॒दा मे॒धसा॑तये॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

English Transliteration

nahi vāṁ vavrayāmahe thendram id yajāmahe śaviṣṭhaṁ nṛṇāṁ naram | sa naḥ kadā cid arvatā gamad ā vājasātaye gamad ā medhasātaye nabhantām anyake same ||

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Pad Path

न॒हि । वा॒म् । व॒व्रया॑महे । अथ॑ । इन्द्र॑म् । इत् । य॒जा॒म॒हे॒ । शवि॑ष्ठम् । नृ॒णाम् । नर॑म् । सः । नः॒ । क॒दा । चि॒त् । अर्व॑ता । गम॑त् । आ । वाज॑ऽसातये । गम॑त् । आ । मे॒धऽसा॑तये । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४०.२

Rigveda » Mandal:8» Sukta:40» Mantra:2 | Ashtak:6» Adhyay:3» Varga:24» Mantra:2 | Mandal:8» Anuvak:5» Mantra:2


SHIV SHANKAR SHARMA

पुनः उसकी व्यापकता दिखलाते हैं।

Word-Meaning: - (कविः) महाकवि सर्वज्ञ (अग्निः) सर्वाधार जगदीश (विदथा) विज्ञातव्य और (त्रिधातूनि) ईश्वर, जीव और प्रकृतिरूप तीन पदार्थों से युक्त (त्रीणि) तीनों लोकों में (आक्षेति) निवास करता है, (विप्रः) पुनः परम ज्ञानी (दूतः) दूत के समान सर्वतत्त्वज्ञ और (परिष्कृतः) सर्वत्र कर्तृत्व से प्रसिद्ध (सः) वह जगदीश (त्रीन्+एकादशान्) तेंतीसों देवों को (इह+यक्षत्+च) इस संसार में सब प्रकार के दान देवें और (नः) हम उपासकों को भी (पिप्रयत्+च) समस्त कामनाओं से पूर्ण करें ॥९॥
Connotation: - त्रिधातु=पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक ये तीनों धातु अर्थात् पदार्थ। अथवा ईश्वर, जीव और प्रकृति। अथवा कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय और अन्तरिन्द्रिय (मन आदि) ३२ देव=उत्तम, मध्यम और अधम भेद से एकादश इन्द्रिय ही ३३ देव हैं। पञ्चकर्मेन्द्रिय, पञ्चज्ञानेन्द्रिय और एक मन, ये ही एकादश (११) इन्द्रिय देव हैं। परमात्मा ही जब इन पर कृपा करता है, तब इनका प्रकाश होता है। अतः इस कारण भी वही पूज्यदेव है ॥९॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

वाजसातये+मेधसातये

Word-Meaning: - [१] हे (इन्द्राग्नी) = इन्द्र व अग्नि देवो ! हम (वां) = आप से (नहि वव्रयामहे) = कुछ याचना नहीं करते हैं। हम तो (अथ) = अब (इन्द्रं इत्) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु को ही (यजामहे) = पूजते हैं, अपने साथ संगत करते हैं। जो प्रभु (शविष्ठं) = सर्वाधिक शक्तिशाली हैं तथा (नृणां नरम्) = उन्नतिपथ पर चलनेवालों को आगे ले चलनेवाले हैं। [२] (सः) = वे प्रभु (कदाचित्) = कभी तो (नः) = हमें (अर्वता) = कर्मेन्द्रियरूप अश्वों के द्वारा (आगमत्) = प्राप्त होते हैं और (वाजसातये) = शक्ति के लाभ के लिए होते हैं और कभी इन ज्ञानेन्द्रियरूप अश्वों से [इन्द्रियाश्वों से] [सा] (गमदा) = प्राप्त होते हैं और (मेध-सातये) = हमारे साथ यज्ञों को संभक्त करने के लिए होते हैं। प्रभु प्रदत्ता इस वाज [शक्ति] व मेध [यज्ञ] के द्वारा (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ।
Connotation: - भावार्थ- हम किसी भी वस्तु की याचना न करते हुए प्रभु का ही पूजन करें। प्रभु हमें आगे ले चलेंगे। प्रभु हमें इन्द्रियाश्वों के द्वारा शक्ति व यज्ञों को प्राप्त कराते हैं। इस प्रकार हमारे शत्रुओं को नष्ट करते हैं।

SHIV SHANKAR SHARMA

पुनस्तस्य व्यापकतां दर्शयति।

Word-Meaning: - अग्निः सर्वाधार ईशः। त्रिधातूनि=त्रयो धातवः पदार्था ईश्वरजीवप्रकृतिरूपा येषु तानि त्रिधातूनि। त्रीणि जगन्ति। आक्षेति=आक्रम्य निवसति। यानि। विदथा=वेदनीयानि= विज्ञातव्यानि। स पुनः। कविः। सः। त्रीन्+एकादशान्= त्रयस्त्रिंशद्देवान्। इह। यक्षत्=यजतु=ददातु। च पुनः। नः=अस्मान्। पिप्रयत्। प्रपूरयतु। स पुनः। विप्र=सर्वज्ञः। दूतः। परिष्कृतः=परितः कर्ता। शेषं पूर्ववत् ॥९॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - We do not shrink from you, Indra and Agni, nor do we in any way neglect you both. Indeed we invoke and invite Indra, strongest leader of the strong, to be with us. When, for sure, would the lord come to us, come with Agni at the speed of lightning to inspire us with strength for struggle and victory, to bless us with piety, wisdom and intelligence for corporate action with the spirit of yajna? May all negativities, adversities, alienations and enmities vanish.