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तं शि॑शीता स्वध्व॒रं स॒त्यं सत्वा॑नमृ॒त्विय॑म् । उ॒तो नु चि॒द्य ओह॑त आ॒ण्डा शुष्ण॑स्य॒ भेद॒त्यजै॒: स्व॑र्वतीर॒पो नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

English Transliteration

taṁ śiśītā svadhvaraṁ satyaṁ satvānam ṛtviyam | uto nu cid ya ohata āṇḍā śuṣṇasya bhedaty ajaiḥ svarvatīr apo nabhantām anyake same ||

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Pad Path

तम् । शि॒शी॒त॒ । सु॒ऽअ॒ध्व॒रम् । स॒त्यम् । सत्वा॑नम् । ऋ॒त्विय॑म् । उ॒तो इति॑ । नु । चि॒त् । यः । ओह॑ते । आ॒ण्डा । शुष्ण॑स्य । भेद॑ति । अजैः॑ । स्वः॑ऽवतीः । अ॒पः । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४०.११

Rigveda » Mandal:8» Sukta:40» Mantra:11 | Ashtak:6» Adhyay:3» Varga:25» Mantra:5 | Mandal:8» Anuvak:5» Mantra:11


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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

आण्डा शुष्णस्य भेदति

Word-Meaning: - [१] (तं) = उस प्रभु को (शिशीत) = अपने अन्दर तीक्ष्ण करो-स्तुतियों से संस्कृत करो, जो प्रभु (सत्यं) = सत्यस्वरूप हैं, (सत्वानम्) = शक्तिसम्पन्न हैं। (स्वध्वरं) = उत्तम यज्ञ आदि कर्मों के सिद्ध करनेवाले हैं। जिनकी शक्ति से उपासक यज्ञ आदि कर्मों को कर पाता है, अतएव (ऋत्वियम्) = प्रभु ऋतु-ऋतु में अर्थात् सदा उपासना के योग्य हैं। [२] (उत उ नु चित्) = और निश्चय से (यः) = जो प्रभु (ओहते) = स्तुति किये जाते हैं वे (शुष्णस्य आण्डा) = कामदेव के अपत्यों को भी (भेदति) = विदीर्ण कर देते हैं-वासना के मूल को ही विनष्ट कर देते हैं और (स्वर्वती:) = प्रकाश व सुख को प्राप्त करानेवाले (अपः) = रेतः कणों को (अजै:) = जीतते हैं। इस प्रकार काम विनाश से (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = विनष्ट हों।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु 'स्वध्वर- सत्य - सत्वा-ऋत्विय' हैं। इनकी स्तुति जब उपासक करता है, तो प्रभु काम का समूल विनाश कर देते हैं और हमारे रेतःकणों का रक्षण कर के हमारे सब वासना व रोगरूप शत्रुओं का विनाश कर देते हैं।
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Adore and glorify the lord of love, non-violence and holy yajnic action, who is ever true and eternal, who rewards acts of truth and piety and inspires us to think and meditate on piety and divinity, who breaks down the roots and fruits of impiety and exploitation and conquers the streams of joy and prosperity to set them aflow. May impiety, illiberality, untruth and exploitation, all vanish from the world.