Go To Mantra
Viewed 361 times

स॒हस्रे॑णेव सचते यवी॒युधा॒ यस्त॒ आन॒ळुप॑स्तुतिम् । पु॒त्रं प्रा॑व॒र्गं कृ॑णुते सु॒वीर्ये॑ दा॒श्नोति॒ नम॑उक्तिभिः ॥

English Transliteration

sahasreṇeva sacate yavīyudhā yas ta ānaḻ upastutim | putram prāvargaṁ kṛṇute suvīrye dāśnoti namaüktibhiḥ ||

Pad Path

स॒हस्रे॑णऽइव । स॒च॒ते॒ । य॒वि॒ऽयुधा॑ । यः । ते॒ । आन॑ट् । उप॑ऽस्तुतिम् । पु॒त्रम् । प्रा॒व॒र्गम् । कृ॒णु॒ते॒ । सु॒ऽवीर्ये॑ । दा॒श्नोति॑ । नम॑ऽउक्तिऽभिः ॥ ८.४.६

Rigveda » Mandal:8» Sukta:4» Mantra:6 | Ashtak:5» Adhyay:7» Varga:31» Mantra:1 | Mandal:8» Anuvak:1» Mantra:6


SHIV SHANKAR SHARMA

ईश्वरोपासक क्या-२ पाता है, यह इससे दिखलाते हैं।

Word-Meaning: - हे इन्द्र ! (यः) जो विद्वान् (ते) तेरी (उपस्तुतिम्) साहाय्य (आनट्) प्राप्त करता है, वह (सहस्रेण+इव) मानो सहस्रों प्रकार के (यवीयुधा) युद्धबल से (सचते) सम्मिलित होता है और जो (नमउक्तिभिः) नमस्कार वचनों से=सत्कारपूर्वक (दाश्नोति) दरिद्र पुरुषों को दान देता है, वह (प्रावर्गम्) शत्रुओं को हटानेवाले (सुवीर्य्ये) शोभनवीर्य्ययुक्त पुत्र को (कृणुते) उत्पन्न करता है। अथवा (सुवीर्य्ये) महासंग्राम के लिये शत्रुविजेता अपत्य पाता है ॥६॥
Connotation: - हे मनुष्यो ! ईश्वर की सहायता वे ही प्राप्त कर सकते हैं, जो उसकी आज्ञा में चलते हैं। उसी की कृपा वास्तव में महाबल है। जो ईश्वर की कृपा का पात्र है, उसको जगत् में सम्राट् भी गिरा नहीं सकता, उसके उपासक के पुत्रादि भी महाबलिष्ठ और विजेता होते हैं। अतः उसी की कृपा के पात्र बनो, शुभकर्म करके उसके आशीर्वाद के भाजन होओ ॥६॥

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (यवियुधा) वह पुरुष विद्युत् के समान युद्ध करनेवाला होकर (सहस्रेणेव) सहस्रों बलों से (सचते) संगत होता है, (यः) जो (ते) आपकी (उपस्तुतिं) अल्प स्तुति को भी (आनट्) करता है और जो (नमउक्तिभिः) नम्र वचनों से (दाश्नोति) आपका भाग देता है वह (सुवीर्ये) सुन्दर पराक्रमवाले आपकी अध्यक्षता में (पुत्रं) अपनी सन्तान को (प्रावर्गं) अतिशय अनिवार्य (कृणुते) बनाता है ॥६॥
Connotation: - हे युद्धविद्याविशारद कर्मयोगिन् ! आपकी स्तुति द्वारा आपसे शिक्षा प्राप्त किया हुआ पुरुष अति तीव्र युद्ध करनेवाला तथा सहस्रों योद्धाओं से युक्त होता है और जो नम्रतापूर्वक आपका सत्कार करता है, वह स्वयं युद्धविशारद होता और कर्मयोगी की अध्यक्षता में रहने के कारण उसकी सन्तान भी संग्राम में कुशल होती है अर्थात् उसको कोई युद्ध में निवारण=हटा नहीं सकता ॥६॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

प्रावर्ग पुत्र

Word-Meaning: - [१] हे प्रभो ! (यः) = जो (ते) = आपकी (स्तुतिं आनट्) = स्तुति को व्यापता है, अर्थात् सदा आपका स्तवन करता हुआ कार्यों को करता है वह (सहस्रेण इव) = हजारों के समान (यवीयुधा) = शत्रु-नाशक बल से सचते संयुक्त होता है। स्तोता के अन्दर हजारों पुरुषों का बल आ जाता है और यह शत्रु नाश करने में समर्थ होता है। [२] (नम उक्तिभिः) = नमन के वचनों से, प्रभु के प्रति इन स्तुति-वचनों से (सुवीर्ये) = उत्तम वीर्य के होने पर (पुत्रम्) = सन्तान को (प्रावर्गम्) = प्रकर्षेण शत्रुओं का वर्जन करनेवाला (कृणुते) = करता है। अर्थात् इस उपासक की सन्तान नीरोग व निर्मल होती है । और यह इन स्तुति वचनों से सब शत्रुओं को (दानोति) = समाप्त करनेवाला होता है।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु-स्तवन से हजारों पुरुषों के बल के समान बल प्राप्त होता है। सन्तान नीरोग व निर्मल मनवाली होती है। हम भी सब शत्रुओं का शातन [संहार] कर पाते हैं।

SHIV SHANKAR SHARMA

ईशोपासकः किं किं लभत इत्यनया दर्शयति।

Word-Meaning: - हे इन्द्र ! यो विद्वान्। ते=तव। उपस्तुतिम्=साहाय्यम्। आनट्=व्याप्नोति लभते। सः। सहस्रेण इव=अनन्तेन। सहस्रशब्दोऽनन्तवाची। यवीयुधा=युद्धबलेन। सचते= समवेतः संमिलितो भवति। षच समवाये। यश्च पुरुषः। नमउक्तिभिः=नमस्कारवचनैः सत्कारपूर्वकम्। दाश्नोति= दरिद्रेभ्यो ददाति। स खलु। प्रावर्गम्=प्रकर्षेण शत्रूणां प्रवर्जयितारं निरासयितारम्। सुवीर्य्ये=सुवीर्य्यं शोभनवीर्य्योपेतम्। द्वितीयार्थे सप्तमी। पुत्रम्। कृणुते=जनयति। यद्वा। सुवीर्य्ये शोभनवीर्य्ययुक्ते संग्रामे पुत्रं कृणुते ॥६॥

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (यवियुधा) विद्युदिव योद्धा सन् स पुरुषः (सहस्रेणेव) सहस्रप्रकारकेण बलेन (सचते) संगतो भवति (यः) यः पुरुषः (ते) तव (उपस्तुतिं) उपस्तोत्रं (आनट्) प्राप्नोति, यश्च (नमउक्तिभिः) नमोवचनैः (दाश्नोति) भवद्भागं ददाति सः (सुवीर्ये) शोभनपराक्रमसहिते भवति पालके (पुत्रं) स्वसन्तानं (प्रावर्गं) प्रकर्षेण शत्रूणां वर्जयितारं (कृणुते) करोति ॥६॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - The youthful warrior who pays you homage and does honour and reverence to you, and the one who gives in charity, in service to you, with holy chants and humility receives the strength of a thousand heroes and, under the guidance and care of the lord, renders his progeny unconquerable and exclusive in merit and prowess.