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परा॒ गावो॒ यव॑सं॒ कच्चि॑दाघृणे॒ नित्यं॒ रेक्णो॑ अमर्त्य । अ॒स्माकं॑ पूषन्नवि॒ता शि॒वो भ॑व॒ मंहि॑ष्ठो॒ वाज॑सातये ॥

English Transliteration

parā gāvo yavasaṁ kac cid āghṛṇe nityaṁ rekṇo amartya | asmākam pūṣann avitā śivo bhava maṁhiṣṭho vājasātaye ||

Pad Path

परा॑ । गावः॑ । यव॑सम् । कत् । चि॒त् । आ॒घृ॒णे॒ । नित्य॑म् । रेक्णः॑ । अ॒म॒र्त्य॒ । अ॒स्माक॑म् । पू॒ष॒न् । अ॒वि॒ता । शि॒वः । भ॒व॒ । मंहि॑ष्ठः । वाज॑ऽसातये ॥ ८.४.१८

Rigveda » Mandal:8» Sukta:4» Mantra:18 | Ashtak:5» Adhyay:7» Varga:33» Mantra:3 | Mandal:8» Anuvak:1» Mantra:18


SHIV SHANKAR SHARMA

रक्षा के लिये परमेश्वर ही प्रार्थनीय है।

Word-Meaning: - (आघृणे) हे सर्वप्रकाशक भगवन् ! (कच्चित्) किसी समय में यदि (गावः) हमारे गौ आदि पशु (यवसम्) तृण चरने के लिये (परा) दूर देश में जाएँ, तब आपकी कृपा से (रेक्णः) वह गोरूप धन (नित्यम्) ध्रुव होवे अर्थात् चौर व्याघ्रादिक से हिंसित न होवे। (अमर्त्य) हे नित्य शाश्वत ईश ! (पूषन्) हे पोषक ! (अस्माकम्) हम लोगों का रक्षक होकर (शिवः+भव) कल्याणकारी हो तथा (वाजसातये) विज्ञानप्राप्त्यर्थ (मंहिष्ठः) अत्यन्त दाता बन ॥१८॥
Connotation: - यह स्वाभाविकी प्रार्थना है। सब कार्य में प्रथम महेश प्रार्थनीय है, यह दिखलाते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि मन से ध्यात ईश प्रसन्न होता है ॥१८॥

ARYAMUNI

अब गवादि पशुओं के लिये चारारूप तृण के लिये प्रार्थना करना कथन करते हैं।

Word-Meaning: - (अमर्त्य) हे रोगादिरहित कर्मयोगिन् ! (गावः) मेरी गाएँ (कच्चित्) किसी समय (यवसम्) तृण को (परा) भक्षण करने के लिये यदि जाएँ तो (रेक्णः) वह उनका तृणरूप धन (नित्यम्) नित्य हो (पूषन्) हे पोषक इन्द्र ! (अस्माकं) हम जिज्ञासुओं के (शिवः, अविता, भव) कल्याणमय रक्षक आप हों (वाजसातये) धनदान के लिये (मंहिष्ठः) उदारतम हों ॥१८॥
Connotation: - हे सबके पालक कर्मयोगिन् ! हमारी गौओं के भक्षणार्थ तृणरूप धन नित्य हो। मन्त्र में “गावः” पद सब पशुओं का उपलक्षण है अर्थात् हमारे पशुओं के लिये नित्य पुष्कल उत्तम चारा मिले, जिससे वह हृष्ट-पुष्ट रहें। हे कर्मयोगिन् ! आप हम जिज्ञासुओं के सदैव रक्षक हों और हमारे लिये धन-दान देने में सदा उदारभाव हों ॥१८॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

नित्यं रेक्णः

Word-Meaning: - [१] हे (आघृणे) = सर्वत दीप्त प्रभो ! (गाव:) = हमारी ये इन्द्रियाँ (परा) = दूर बाहिर की ओर (यवसम्) = विषयरूप घास को चरने के लिये जाती हैं। हे (अमर्त्य) = हमें न नष्ट होने देनेवाले प्रभो ! (कच्चित्) = क्या कभी ये इन्द्रियाँ (नित्यं रेक्णः) = उस अविनश्वर ज्ञानरूप धन को लेने के लिये भी चलेंगी? क्या हमारी इन्द्रियाँ ज्ञान की रुचिवाली न बनेगी ? [२] हे (पूषन्) = पोषक प्रभो ! आप (अस्माकम्) = हमारे (अविता) = रक्षक व (शिवः) = कल्याण करनेवाले (भव) = होइये। आप (वाजसातये) = शक्ति को प्राप्त कराने के लिये (मंहिष्ठ:) = दातृतम होइये । आप हमें अधिक से अधिक शक्ति को प्राप्त करानेवाले हों। यह शक्ति ही हमारा रक्षण व कल्याण करेगी। विषयों में भटककर इन्द्रियाँ शक्तियों को जीर्ण कर लेती थीं। आप की कृपा से ये ज्ञान की ओर झुकी और हम अमंगल से बच गये।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु के अनुग्रह से हमारी इन्द्रियाँ विषयों में न भटककर ज्ञानरूप नित्य धन की प्राप्ति के लिये झुकाववाली हों। प्रभु हमारा रक्षण करें और अधिक से अधिक शक्ति को प्राप्त करायें ।

SHIV SHANKAR SHARMA

रक्षायै परमेश्वर एव प्रार्थनीयः।

Word-Meaning: - हे आघृणे=हे सर्वप्रकाशक देव ! कच्चित्=कस्मिंश्चित्काले=यदा कदाचित्। अस्मदीयाः। गावः=गवादिपशवः। यदि। यवसम्=तृणं भक्षयितुम्। परा=दूरदेशे। गच्छेयुः। तदा। हे अमर्त्य=मरणरहित नित्येश्वर ! तद्। रेक्णः=गोरूपधनम्। नित्यम्=ध्रुवं भवतु। चौरव्याघ्रादिभिर्न हिंसितं भवतु। हे पूषन्=पोषक इन्द्र ! अस्माकम्। अविता=रक्षको भूत्वा। शिवो भव। तथा। वाजसातये=ज्ञानप्राप्त्यर्थम्। मंहिष्ठोऽतिशयेन दाता भव ॥१८॥

ARYAMUNI

अथ गोरक्षायोग्यपदार्थाः प्रार्थ्यन्ते।

Word-Meaning: - (अमर्त्य) हे रोगादिरहित कर्मयोगिन् ! (गावः) मदीया गावः (कच्चित्) कस्मिंश्चित्काले (यवसं) तृणं (परा) अत्तुं परागच्छेयुः तदा (रेक्णः) तद्गोस्तृणरूपं धनम् (नित्यम्) नित्यं भवतु (पूषन्) हे पोषक ! (अस्माकम्) अस्माकं जिज्ञासूनां (शिवः, अविता, भव) कल्याणमयः रक्षको भव (वाजसातये) धनदानाय (मंहिष्ठः) उदारतमो भव ॥१८॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O lord of light and immortality, our cows go far and wide for pasture, let that wealth of ours be always constant and imperishable. O lord most potent giver of health and generous nourishment, be our protector and saviour, and our source of peace and well being for the sake of ultimate victory.