Word-Meaning: - [१] (अहं) = मैं (सरस्वतीवतो:) = ज्ञान की अधिष्ठात्री देवतावाले (इन्द्राग्न्योः) = इन्द्र और अग्नि की (अव:) = रक्षा को वृणे सर्वथा वरता हूँ। इन्द्राग्नी का आराधन ही मुझे सरस्वती का प्रशस्त आराधक बनाता है। बल व बुद्धि से युक्त होकर ही मैं सरस्वती का आराधक बन पाता हूँ। [२] मैं उन इन्द्र और अग्नि के का वरण करता हूँ। (याभ्यां) = जिनसे (गायत्रं) = प्राणरक्षक स्तवन (ऋच्यते) = स्तुत होता है । इन्द्र और अग्नि ही वस्तुतः प्राणरक्षक सोम का उच्चरण करते हैं। मैं बल व प्रकाश से युक्त होकर हृदय में उस स्तुति की वृत्ति को अपना पाता हूँ, जो मेरी प्राणरक्षा का साधन बनती है ।
Connotation: - भावार्थ:-बल व प्रकाश का आराधन मुझे प्रशस्त ज्ञान को प्राप्त करता है। इस आराधन से ही मैं उस स्तवन को करता हूँ, जो मेरा प्राणरक्षक बनता है। बल व प्रकाश के आराधन से यह 'नाभाग' बनता है - One who nips evil in the Bud. रोग व वासनारूप शत्रु को प्रारम्भ में ही समाप्त करनेवाला [मम् हिंसात्मक] । यही समझदारी है कि बुराई को प्रारम्भ ही में समाप्त किया जाए, सो यह 'कण्व' है। यह 'अग्नि' नाम से प्रभु का आराधन करता है-