सोमरक्षण व ज्ञानवाणियों का उच्चारण
Word-Meaning: - [१] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष, (शविष्ठ) = अतिशयेन शक्ति सम्पन्न पुरुष ! तू (सोम्यं मधु) = इस सोम-सम्बन्धी मधु को (पीतये) = पीने के लिये (आयाहि) = आ। प्रातः सायं प्रभु के समीप उपस्थित होने से ही तू सोम का पान कर सकेगा। यह सोम सब भोजन के रूप में गृहीत ओषधियों का सार है, अतएव 'मधु' है। [२] इस सोमपान के लिये प्रातः सायं प्रभु चरणों में उपस्थित होना इसलिए आवश्यक है कि इस सोमपान के बिना (अयम्) = यह (मघवा) = ऐश्वर्यशाली (सुक्रतुः) = शोभनकर्मा प्रभु (अच्छा) = आभिमुख्येन (गिरः) = हमारे से उच्चारित ऋग् रूप वाणियों को (ब्रह्म) = अन्य यजुरूप वाणियों को व (उक्था) = सामरूप स्तोत्रों को (न शृणवत्) = नहीं सुनते। सोमरक्षण के अभाव में इन 'गिर् ब्रह्म व उक्थों' का उच्चारण हमें प्रभु का प्रिय नहीं बनाता।
Connotation: - भावार्थ- हम ऋग्, यजु, सामरूप वाणियों का उच्चारण करें। इनका उच्चारण करते हुए सोमरक्षण का ध्यान करें। सोमरक्षण के अभाव में केवल इन वाणियों का उच्चारण हमें प्रभु का प्रिय न बनायेगा।