प्रभु के आश्चर्यकारक कर्म
Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार तू उस प्रभु का हृदय में धारण कर [भर] (यः) = जो (उद्नः) = जल के हेतु से (फलिगम्) = मेघ को [विशीर्ण होकर इधर-उधर गति करनेवाला फल् + गम् ] (भिनत्) = विदीर्ण करता है। इसे विदीर्ण करके (न्यक्) = नीचे (सिन्धून्) = जल-प्रवाहों को (अवासृजत्) = उत्पन्न करता है। [२] उस प्रभु का धारण कर (यः) = जो गोषु गौओं में (पक्वम्) = परिपक्व दूध को (धारयत्) = धारण करते हैं। गोस्तन से वे बाहिर आता हुआ दूध खूब उष्णता को लिये हुए होता है। इस प्रभु के धारण से ही हम शरीर में सोम का रक्षण कर सकेंगे।
Connotation: - भावार्थ- 'मेघों का विदारण, जलप्रवाहों की सृष्टि व गौवों से उष्ण दुग्ध की प्राप्ति' ये सब बातें ही हमें आश्चर्य में डाल देती हैं और प्रभु की महिमा का स्मरण कराती हैं।