Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार ज्ञान की वाणियों का अध्ययन करता हुआ तू यथा (सूर्य:) = जैसे सूर्य होता है, वैसा ही बन। सूर्य की तरह ही रश्मिं सृज - अपने अन्दर ज्ञानरश्मियों को उत्पन्न कर। सूर्य की तरह ही तू प्रकाश को देनेवाला हो। (त्वा) = तुझे (मे गिरः) = मेरी ये वेदरूप ज्ञान की वाणियाँ यच्छन्तु नियमित करनेवाली हों। इनके अनुसार ही तेरा जीवन बने। ये तेरे लिये कार्य व अकार्य की व्यवस्थिति में प्रमाण हों। [२] ये वाणियाँ (सध्यक्) = [सह अञ्चन्ति] मिलकर गति करती हुईं तुझे (आपः न) = जलों की तरह (निम्नम्) = नम्रता के मार्ग में नियमित करनेवाली हों। 'ऋग्' विज्ञान है, 'यजु' कर्म है, 'साम' उपासना। ये तीनों तेरे अन्दर मिलकर गति करें। तू ज्ञानपूर्वक कर्म कर तथा उन कर्मों को प्रभु के प्रति अर्पण करता हुआ प्रभु का उपासक बन। इस प्रकार तू जीवन में नम्र हो ।
Connotation: - भावार्थ- हम अपने अन्दर ज्ञान के सूर्य का उदय करें। प्रभु की इन वेद-वाणियों के अनुसार जीवन को बनायें । 'ज्ञान, कर्म, उपासना' के मेल से जीवन में नम्रतावाले बनें।