न दे॒वाना॒मपि॑ ह्नुतः सुम॒तिं न जु॑गुक्षतः । श्रवो॑ बृ॒हद्वि॑वासतः ॥
English Transliteration
na devānām api hnutaḥ sumatiṁ na jugukṣataḥ | śravo bṛhad vivāsataḥ ||
Pad Path
न । दे॒वाना॑म् । अपि॑ । ह्नु॒तः । सु॒ऽम॒तिम् । न । जु॒गु॒क्ष॒तः॒ । श्रवः॑ । बृ॒हत् । वि॒वा॒स॒तः॒ ॥ ८.३१.७
Rigveda » Mandal:8» Sukta:31» Mantra:7
| Ashtak:6» Adhyay:2» Varga:39» Mantra:2
| Mandal:8» Anuvak:5» Mantra:7
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SHIV SHANKAR SHARMA
Word-Meaning: - पुनरपि दम्पती के विशेषण में यह ऋचा कही गई है। यथा−जो स्त्री पुरुष ईश्वरानुरागी होते हैं, वे (देवानाम्) देवों से (न+अपि+ह्नुतः) अपलाप नहीं करते हैं। प्रतिज्ञा करके न देने का नाम अपलाप है और (सुमतिम्) ईश्वर-प्रदत्त सुबुद्धि को (न+जुगुक्षतः) नहीं छिपाते हैं। अर्थात् निज बुद्धि द्वारा अन्यान्य जनों का उपकार करते हैं और इस प्रकार शुभाचरणों से जगत् में (विवासतः) विस्तार करते हैं या देते हैं ॥७॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
यज्ञ-सुमति-ज्ञान
Word-Meaning: - [१] ये पति-पत्नी (देवानाम्) = देवों का (न अपिह्नुतः) = कभी प्रवंचन नहीं करते देवों से दिये हुये भोजनों को देवों के लिये न देकर सबका सब स्वयं नहीं खा जाते। उनके लिये बिना दिये सब खा जानेवाले चोर ही तो होते हैं। [२] ये पति-पत्नी (सुमतिम्) = कल्याणी मति को कभी (न जुगुक्षतः) = संवृत नहीं करते। इनकी बुद्धि पर वासना का परदा नहीं पड़ता। [३] ये पति-पत्नी इस दीप्त बुद्धि से (बृहत् श्रवः) = विशाल ज्ञान को (विवासतः) = धारण करते हैं।
Connotation: - भावार्थ - यज्ञशील बनें। यज्ञशीलता से बुद्धि पर लोभ का परदा नहीं पड़ जाता। अनावृत बुद्धि से ज्ञान का विस्तार होता है।
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SHIV SHANKAR SHARMA
Word-Meaning: - पुनरपि दम्पती विशिष्येते−यौ दम्पती ईश्वरानुरागिणौ भवतः। तौ। देवानां विदुषाम्। न अपिह्नुतो नापलापं कुरुतः। अपिह्नवोऽपह्नवोऽपलापः। देवेभ्यो दास्यामीति प्रतिज्ञाय पुनरदानमपलापः। तथा सुमतिं परमेश्वरात्प्राप्तां सुबुद्धिं न जुगुक्षतः न जुघुक्षतः। न संवरीतुमिच्छतः। संवरणमाच्छादनम्। न आच्छादयः। अपि च। शुभाचरणैः। जगति। बृहत् श्रवो यशोऽन्नं वा। विवासतः परिचरतः परितो विस्तारयतः प्रयच्छतो वा ॥७॥
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DR. TULSI RAM
Word-Meaning: - Never do they neglect the divinities nor do they minimize the gifts of their favour and good will, and thus indeed do they shine bright in glory and exalt the gifts of divinity.
