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न य॑जमान रिष्यसि॒ न सु॑न्वान॒ न दे॑वयो । दे॒वानां॒ य इन्मनो॒ यज॑मान॒ इय॑क्षत्य॒भीदय॑ज्वनो भुवत् ॥

English Transliteration

na yajamāna riṣyasi na sunvāna na devayo | devānāṁ ya in mano yajamāna iyakṣaty abhīd ayajvano bhuvat ||

Pad Path

न । य॒ज॒मा॒न॒ । रि॒ष्य॒सि॒ । न । सु॒न्वा॒न॒ । न । दे॒व॒यो॒ इति॑ देवऽयो । दे॒वाना॑म् । यः । इत् । मनः॑ । यज॑मानः । इय॑क्षति । अ॒भि । इत् । अय॑ज्वनः । भु॒व॒त् ॥ ८.३१.१६

Rigveda » Mandal:8» Sukta:31» Mantra:16 | Ashtak:6» Adhyay:2» Varga:40» Mantra:6 | Mandal:8» Anuvak:5» Mantra:16


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SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - (यजमान) हे यजमान ईश्वरपूजक जन ! यदि आप सदा परमात्मा का ही यजन करते हैं, तो (न रिष्यसि) न कदापि विनष्ट होंगे। (सुन्वान) हे शुभकर्म सम्पादक जन ! यदि आप सदा शुभकर्म ही करते रहेंगे, तो (न+रिष्यसि) आपका विनाश कदापि न होगा तथा (देवयो) हे देवाभिलाषीजन ! यदि आप सदा एक देव की ही इच्छा करेंगे तो (न+रिष्यसि) आप कभी नष्ट न होंगे। इसी प्रकार (यः+यजमानः) पूर्ववत् ॥१६॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'यजमान-सुन्वान-देवयु'

Word-Meaning: - [१] हे (यजमान) = यज्ञशील पुरुष ! तू (न रिष्यसि) = हिंसित नहीं होता, तुझे वासनाएँ आक्रान्त नहीं कर पातीं। हे (सुन्वान) = अपने शरीर में सोम का सम्पादन करनेवाले पुरुष ! न तू हिंसित नहीं होता । हे (देवयो) = उस प्रकाशमय प्रभु को अपने साथ जोड़ने की कामनावाले पुरुष ! तू (न) = हिंसित नहीं होता। 'यजमान, सुन्वान व देवयु' बनकर हम वासनाओं के आक्रमण से अपने को बचायें। [२] (यः) = जो भी (यजमानः) = यज्ञशील बनकर (देवानां मनः) = देवों के मन को (इत्) = निश्चय से (इयक्षति) = अपने साथ संगत करने की कामना करता है, वह (इत्) = निश्चय से (अयज्वनः) = अयज्ञशील पुरुषों को (अभिभवत्) = अभिभूत करनेवाला होता है।
Connotation: - भावार्थ- हम यज्ञशील बनें, शरीर में सोम शक्ति का सम्पादन करें, उस देव [प्रभु] को प्राप्त करने की कामनावाले हों। ऐसा होने पर हम वासनारूप शत्रुओं से हिंसित न होंगे। यज्ञशील बनकर दिव्य मनवाले होते हुए हम अयज्ञशील पुरुषों का अभिभव करनेवाले हों। यज्ञशीलता हमें अयज्ञशीलों से ऊपर उठाये ।
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SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - हे यजमान ! ईश्वरपूजकजन ! यदि त्वम्। परमात्मानमेव यजसि। तर्हि त्वं। न रिष्यसि विनष्टो न भवति। न तव नाशो भविष्यतीत्यर्थः। हे सुन्वान ! हे शुभकर्मसम्पादक ! यदि त्वम्। सदा शुभान्येव कर्म्माणि करोषि तदा त्वं न रिष्यसि न विनश्यसि। हे देवयो ! परमात्मानम् कामयते यः स देवयुः। तस्य सम्बोधने हे देवयो सदा देवकामिन्। यदि त्वम्। सर्वं विहाय केवलमेकमेव ईशम् कामयसे। तदा त्वं न रिष्यसि। यश्च यजमान उपासकः। यश्च देवानाम्। इत्यादि पूर्ववत् ॥१६॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O man of charity and yajnic service to humanity and divinity, you will never suffer wrong or damage, O creator of soma dedicated to yajna to the divinities, you will never be hurt and never fail in your life’s mission. The yajamana who, with sincere mind and actions, performs yajna in service to the divinities of nature and humanity surpasses the uncharitables who never perform yajnic service in the field of creative fellowship and cooperation with others, human and divine.