मित्रावरुणौ (स्नेह व निर्देषता )
Word-Meaning: - [१] इस जीवनयात्रा में (द्वा) = दो मित्र और वरुण, स्नेह व निद्वेषता के भाव (दिवि) = सदा प्रकाशमय लोक में, स्वर्ग में (सदः चक्राते) = हमारा घर बनाते हैं, निवास करते हैं। यदि संसार में हम स्नेह व निर्देषता से चलें तो जीवनयात्रा बड़ी सुखमय व निर्विघ्न रहती है। [२] ये मित्र और वरुण (उपमा) = [उप+मा] सब कुछ देनेवाले हैं। इनके होने पर 'स्वास्थ्य, शान्ति व बुद्धि' प्राप्त होती है। (सम्राजा) = ये हमारे जीवनों को सम्यक् दीप्त करते हैं। और (सर्पिरासुती) = [सर्पिः = उदकं = रेतः नि० १.१२] शरीर में रेतःकण रूप जलों को सर्वत्र आसुत करनेवाले हैं। स्नेह व निर्देषता के होने पर शरीर में इन वीर्यकणों का सम्यक् प्रतिष्ठान होता है। 'सर्पिस्' का अर्थ घृत भी है, घृत 'दीप्ति' का पर्याय है। रेतःकणों के रक्षण के द्वारा हमारे जीवनों में ज्ञानदीप्ति चमक उठती है।
Connotation: - भावार्थ-स्नेह व निद्वेषता ही इस जीवनयात्रा के मूल मन्त्र हैं, ये जीवन को स्वर्गतुल्य बना देते हैं, दीस कर देते हैं, शक्ति सम्पन्न करते हैं।