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प्र स क्षयं॑ तिरते॒ वि म॒हीरिषो॒ यो वो॒ वरा॑य॒ दाश॑ति । प्र प्र॒जाभि॑र्जायते॒ धर्म॑ण॒स्पर्यरि॑ष्ट॒: सर्व॑ एधते ॥

English Transliteration

pra sa kṣayaṁ tirate vi mahīr iṣo yo vo varāya dāśati | pra prajābhir jāyate dharmaṇas pary ariṣṭaḥ sarva edhate ||

Pad Path

प्र । सः । क्षय॑म् । ति॒र॒ते॒ । वि । म॒हीः । इषः॑ । यः । वः॒ । वरा॑य । दाश॑ति । प्र । प्र॒ऽजाभिः॑ । जा॒य॒ते॒ । धर्म॑णः । परि॑ । अरि॑ष्टः । सर्वः॑ । ए॒ध॒ते॒ ॥ ८.२७.१६

Rigveda » Mandal:8» Sukta:27» Mantra:16 | Ashtak:6» Adhyay:2» Varga:33» Mantra:6 | Mandal:8» Anuvak:4» Mantra:16


SHIV SHANKAR SHARMA

विद्वानों की सेवा का माहात्म्य दिखलाते हैं।

Word-Meaning: - हे विद्वानो ! (यः) जो मनुष्य (वराय) निज-२ कल्याण के लिये (वः) आप लोगों के निकट (दाशति) सब कुछ अच्छे भाव से समर्पित करता है (सः) वह (क्षयम्+प्रतिरते) अपने गृह को दृढ़ और मनोहर बनाकर बढ़ाता है। पुनः वह (इषः+महीः) सम्पत्तियों को बहुत (वि+तिरते) विशेष रूप से संचय करता जाता है और (धर्मणः+परि) धर्म के अनुसार (प्रजाभिः+प्रजायते) पुत्र पौत्रादिकों के साथ जगत् में विख्यात होता है। बहुत क्या कहें, (सर्वः) विद्वानों के सब ही सेवक (अरिष्टः) अहिंसित, उपद्रवरहित और आह्लादित हो (एधते) समाज में उन्नति की ओर बढ़ते जाते हैं ॥१६॥
Connotation: - हे मनुष्यों ! विद्वानों की सेवा करो, विद्या से ही तुम्हारी सब प्रकार की उन्नति होगी ॥१६॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

दान व सर्वतो वृद्धि

Word-Meaning: - [१] हे देवो ! (यः) = जो (वराय) = उत्कृष्ट कार्यों के लिये (वः दाशति) = आपके प्रति दान करनेवाला होता है (सः) = वह (क्षयम्) = अपने गृह को (प्रतिरते) = खूब बढ़ानेवाला होता है। यह (महीः इषः) = महत्त्वपूर्ण अन्नों को बढ़ानेवाला होता है, इसके घर में सात्त्विक भोजनों की कमी नहीं रहती । [२] यह (धर्मणाः) = धर्म के द्वारा (प्रजाभिः) = सन्तानों से (परि प्रजायते सर्वतः) = उत्तम प्रजावाला होता है। और (अरिष्ट:) = अहिंसित होता हुआ (सर्वः एधते) = पूर्ण वृद्धि को प्राप्त होता है, यह 'शारीरिक स्वास्थ्य, मानस प्रसाद व बुद्धि की तीव्रता' रूप सब धनों को प्राप्त करता है।
Connotation: - भावार्थ- उत्तम कार्यों के लिये देवों को देनेवाला पुरुष [क] गृह को बढ़ाता है, [ख] सात्त्विक अन्नों की वहाँ कमी नहीं होती, [ग] उत्तम सन्तान को प्राप्त करता है और [घ] 'शरीर, मन, बुद्धि' सब के दृष्टिकोणों से बढ़ता है।

SHIV SHANKAR SHARMA

विद्वत्सेवामाहात्म्यं विवृणोति।

Word-Meaning: - स पुरुषः। क्षयम्=स्वगृहम्। “क्षयन्ति निवसन्त्यत्रेति क्षयः” प्र+तिरते=दृढतरं मनोहरञ्च कृत्वा वर्धयति। पुनः सः। इषः=सम्पत्तीः। महीः=महतीः। वितिरते=विशेषेण जगति विस्तारयति। पुनः। धर्मणः+परि=यथा धर्मशास्त्रं शिक्षते तं विधिमाश्रित्य। प्रजाभिः=पुत्रपौत्रादिभिः सह। जायते। किं बहुना। सः। अरिष्टः=अहिंसितः सन्। सर्वः=सर्वः खलु विद्वत्सेवकः। एधते=सदा वर्धत एव। यः खलु। वराय=स्वस्वकल्याणाय। वः=युष्मभ्यम्। दाशति=सर्वं समर्पयति ॥१६॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - He thrives in his home and abounds in plenty of wealth, honour and excellence, who gives in charity in obedience to you, Vishvedevas, for the sake of progress. He rises higher and higher with his progeny and friends in Dharma and, unhurt by sin and violence, grows stronger and higher in life.