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यद॒दो दि॒वो अ॑र्ण॒व इ॒षो वा॒ मद॑थो गृ॒हे । श्रु॒तमिन्मे॑ अमर्त्या ॥

English Transliteration

yad ado divo arṇava iṣo vā madatho gṛhe | śrutam in me amartyā ||

Pad Path

यत् । अ॒दः । दि॒वः । अ॒र्ण॒वे । इ॒षः । वा॒ । मद॑थः । गृ॒हे । श्रु॒तम् । इत् । मे॒ । अ॒म॒र्त्या॒ ॥ ८.२६.१७

Rigveda » Mandal:8» Sukta:26» Mantra:17 | Ashtak:6» Adhyay:2» Varga:29» Mantra:2 | Mandal:8» Anuvak:4» Mantra:17


SHIV SHANKAR SHARMA

पुनः उसको कहते हैं।

Word-Meaning: - (अमर्त्या) हे चिरस्थायी यशोयुक्त पुरुषश्रेष्ठ राजा तथा मन्त्रिदल ! (यत्) यदि आप सब (अदः+दिवः+अर्णवे) उस विलाससागर में (मदथः) क्रीड़ा करते हों (वा+इषः+गृहे) यद्वा अन्न के गृह में आनन्द करते हों, उस-२ स्थान से आकर (मे+श्रुतम्+इत्) मेरी स्तुतियों को सुना ही करें ॥१७॥
Connotation: - राजा निज काम त्याग प्रजाओं के काम में सदा तत्पर रहे हैं ॥१७॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

प्राणापान ने मेरी प्रार्थना को कब सुना ?

Word-Meaning: - [१] प्राणसाधना से शरीर में शक्ति का रक्षण होता है। यह सुरक्षित सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है। इसी बात को इस प्रकार कहते हैं कि हे प्राणापानो! (यद्) = जब आप (अदः) = उस (दिवः) = ज्ञान के (क्रर्णवे) = समुद्र में (मदथः) = आनन्द का अनुभव करते हो। तब ही यह कहा जा सकता है कि आपने (मे) = मेरी प्रार्थना को (इत्) = निश्चय से (श्रुतम्) = सुना । [२] ये प्राणापान चित्तवृत्ति के निरोध के द्वारा हृदय को बड़ा पवित्र बनाते हैं। उस पवित्र हृदय में प्रभु प्रेरणा सुनाई पड़ती है । मन्त्र में कहते हैं कि (यद) = जब (इषः) = प्रेरणा के गृहे गृहभूत हृदय में आप वा निश्चय से (मदथः) = आनन्दित होते हो तो हे अमर्त्या हमें न मरने देनेवाले व विषय-वासनाओं का शिकार न होने देनेवाले प्राणापानो! आप मेरी प्रार्थना को सुनते हो ।
Connotation: - भावार्थ- प्राणसाधना का यही फल है कि ज्ञानाग्नि दीप्त होती है और साधक ज्ञानार्णव में तैरता हुआ आनन्द का अनुभव करता है। इसी प्रकार पवित्र हृदय में प्रभु प्रेरणा को सुनता हुआ यह साधक वासनाओं का शिकार नहीं हो जाता।

SHIV SHANKAR SHARMA

पुनस्तमर्थमाह।

Word-Meaning: - हे अमर्त्या=अमर्त्यौ=पुरुषश्रेष्ठौ। अश्विनौ। यद्=यदि। युवाम्। दिवः=क्रीडायाः। अदः+अर्णवे=अमुष्मिन् समुद्रे= विलाससागर इत्यर्थः। मदथः=माद्यथः। वा=यद्वा। इषः=अन्नस्य=भोज्यपदार्थस्य। गृहे माद्यथः। तस्मादपि स्थानादागत्य। मे=मम। स्तोमम्। श्रुतमित्=शृणुतमेव ॥१७॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Whether you are up above in the region of light or surfing in the sea or enjoying yourselves in the house of entertainment, listen to my call and come, immortal ones.