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अधि॒ या बृ॑ह॒तो दि॒वो॒३॒॑ऽभि यू॒थेव॒ पश्य॑तः । ऋ॒तावा॑ना स॒म्राजा॒ नम॑से हि॒ता ॥

English Transliteration

adhi yā bṛhato divo bhi yūtheva paśyataḥ | ṛtāvānā samrājā namase hitā ||

Pad Path

अधि॑ । या । बृ॒ह॒तः । दि॒वः । अ॒भि । यू॒थाऽइ॑व । पश्य॑तः । ऋ॒तऽवा॑ना । स॒म्ऽराजा॑ । नम॑से । हि॒ता ॥ ८.२५.७

Rigveda » Mandal:8» Sukta:25» Mantra:7 | Ashtak:6» Adhyay:2» Varga:22» Mantra:2 | Mandal:8» Anuvak:4» Mantra:7


SHIV SHANKAR SHARMA

पुनः उसी अर्थ को दिखलाते हैं।

Word-Meaning: - पुनः (या) जो आप दोनों (बृहतः+दिवः) बहुत-२ और बड़े-२ विद्वानों को (अभि) अपने सम्मुख (यूथा+इव) झुण्ड के झुण्ड (अधिपश्यतः) ऊपर से देखते हैं (ऋतावाना) सत्यमार्ग पर चलनेवाले (सम्राजा) अच्छे शासक (नमसे) नमस्कार के योग्य (हिता) जगत् के हितकारी हैं ॥७॥
Connotation: - जिस कारण मित्र और वरुण दोनों महाप्रतिनिधि हैं, इसलिये वे उच्च और उत्तम सिंहासन के ऊपर बैठते हैं और अन्यान्य सिंहासन के नीचे बैठते हैं, इसलिये मन्त्र में कहा गया है कि वे दोनों ऊपर से झुण्ड के झुण्ड अपने सामने विद्वानों को देखते हैं ॥७॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

यज्ञ-दीप्ति-नम्रता

Word-Meaning: - [१] (या) = जो मित्र और वरुण हैं, स्नेह व निर्देषता के भाव हैं, ये (बृहतः दिवः) = महान् दिव्यगुणों को हमारे जीवनों में (अधि पश्यतः) = आधिक्येन देखते हैं। स्नेह व निर्देषता के भाव हमारे में दिव्यगुणों को जन्म देते हैं। इस प्रकार ये दिव्यगुणों का ध्यान करते हैं, (इव) = जैसे पालक लोग (यूथा अभि) = गौओं आदि के झुण्डों को देखते हैं। [२] ये मित्र और वरुण (ऋतावाना) = ऋत का, यज्ञ का रक्षण करनेवाले हैं, (सम्राजा) = हमारे जीवनों को सम्यक् दीप्त करनेवाले हैं। और (नमसे हिता) = नमन के लिये हितकर हैं। अर्थात् स्नेह व निर्देषता के भाव हमारे में अभिमान को नहीं उत्पन्न होने देते।
Connotation: - भावार्थ-स्नेह व निर्देषता से [क] दिव्यगुणों की उत्पत्ति होती है, [ख] ऋत का रक्षण होता है, [ग] जीवन देदीप्यमान बनता है और [घ] नम्रता व निरभिमानता की स्थापना होती है।

SHIV SHANKAR SHARMA

पुनस्तमर्थमेव दर्शयति।

Word-Meaning: - पुनः। यूथा इव=यूथानीव। बृहतः=महतः। दिवः=देवान्। या=यौ। अभि=अभिमुखम्। अधिपश्यतः। यौ। ऋतावाना=ऋतावानौ। सम्राजौ। नमसे=नमस्काराय। हिता=हितौ ॥७॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - You who observe the life below on earth from the vast skies, life like hosts of people and herds of cattle, then you, brilliant generous rulers who maintain the laws of eternity, are invoked and invited for the presentation of homage and yajnic service.