Word-Meaning: - [१] यह शरीर रथ है, जो प्रभु से जीवनयात्रा की पूर्ति के लिये दिया जाता है। प्रभु कहते हैं कि (उक्षण्यायने) = उक्षण में, शरीर में ही शक्ति के सेचन में, उत्तम पुरुष में, अर्थात् उत्पन्न वीर्यशक्ति को जो प्राणायाम आदि के द्वारा शरीर में ही सिक्त करता है, उस पुरुष में हम (ऋज्रम्) = ऋजुमार्ग से गति करनेवाले इस (रथम्) = शरीररथ को (असनाम) = [सन् To bestow ] देते हैं। शक्ति को शरीर में सिक्त करनेवाला पुरुष कुटिल स्वभाव नहीं होता। [२] (हरयाणे) = काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रुओं का हरण करनेवाले में, इनको हरा देनेवाले में रजतम् रजत सदृश देदीप्यमान, तेजस्वी अथवा रञ्जनात्मक रथ को हम देते हैं। हरयाण का रथ दीप्त व सब का रञ्जन करनेवाला होता है। यह किसी को अपने व्यवहार से पीड़ित नहीं करता । [३] (सुषामणि) = शोभन सामवाले, शान्तवृत्तिवाले व उत्तम स्तोत्रोंवाले पुरुष में (युक्तम) = [ रथं असनाम] साम्य बुद्धि से युक्त रथ को देते हैं। सुषामा पुरुष साम्य बुद्धि से युक्त होकर स्थितप्रज्ञ बन जाता है। यह डाँवाडोल नहीं होता।
Connotation: - भावार्थ-उक्षण्यायन का रथ ऋ होता है। हरयाण का रजत तथा सुषामा का रथ शोभायुक्त होता है।