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उदु॒ ष्य श॑र॒णे दि॒वो ज्योति॑रयंस्त॒ सूर्य॑: । अ॒ग्निर्न शु॒क्रः स॑मिधा॒न आहु॑तः ॥

English Transliteration

ud u ṣya śaraṇe divo jyotir ayaṁsta sūryaḥ | agnir na śukraḥ samidhāna āhutaḥ ||

Pad Path

उत् । ऊँ॒ इति॑ । स्यः । श॒र॒णे । दि॒वः । ज्योतिः॑ । अ॒यं॒स्त॒ । सूर्यः॑ । अ॒ग्निः । न । शु॒क्रः । स॒म्ऽइ॒धा॒नः । आऽहु॑तः ॥ ८.२५.१९

Rigveda » Mandal:8» Sukta:25» Mantra:19 | Ashtak:6» Adhyay:2» Varga:24» Mantra:4 | Mandal:8» Anuvak:4» Mantra:19


SHIV SHANKAR SHARMA

ब्राह्मण के गुण दिखलाते हैं।

Word-Meaning: - (स्यः) वह मनुष्य हितकारी ब्राह्मण (दिवः+शरणे) द्युलोक तक (सूर्य्यः) सूर्य्य के समान (उद्+अयंस्त+ज्योतिः) ज्योति और विज्ञान को फैलाते हैं (उ) यह बात प्रसिद्ध है और (अग्निर्न) अग्नि के समान स्वयं (शुक्रः) दीप्यमान होते हुए (समिधानः) जगत् को प्रकाशित करते हुए (आहुतः) मनुष्यमात्र से प्रसादित और तर्पित होते हैं ॥१९॥
Connotation: - जो सदा सत्यादि व्रत पालते हुए ज्ञानोपार्जन और परोपकार में ही लगे रहते हैं, वे ब्राह्मण हैं ॥१९॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

प्रभु ही 'सूर्य' हैं, प्रभु ही 'अग्नि'

Word-Meaning: - [१] (स्यः) = वे प्रभु (सूर्य:) = सूर्य हैं। और (दिवः शरणे) = इस देदीप्यमान आदित्य के गृह में, अर्थात् द्युलोक में (ज्योतिः उदयंस्त) = प्रकाश को उदित करते हैं। सम्पूर्ण द्युलोक को प्रभु ही (अवभासित) = करते हैं। यह सूर्य व ये सब नक्षत्र प्रभु के प्रकाश से ही तो प्रकाशित हो रहे हैं। सूर्य के भी सूर्य प्रभु ही हैं। [२] ये प्रभु ही (अग्निः न) = इस अग्निदेव के समान (शुक्रः) = देदीप्यमान हैं। (समिधानः) = स्तोताओं से अपने हृदयों में समिद्ध किये जाते हैं और (आहुतः) = [आ हुते यस्य] सर्वत्र दानोंवाले हैं। और अन्ततः सब प्रभु के प्रति ही अपना अर्पण करते हैं।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु ही सूर्य के रूप में द्युलोक को अवभासित करते हैं। प्रभु ही अग्नि के रूप में समिद्ध व आहुत होते हैं।

SHIV SHANKAR SHARMA

ब्राह्मणगुणान् दर्शयति।

Word-Meaning: - स्यः=सः। दिवः+शरणे=द्युलोकस्य स्थाने। सूर्य्य इव। ज्योतिः। उदयंस्त=उद्यच्छति=उर्ध्वं गमयति। उ=प्रसिद्धम्। अग्निर्न=अग्निरिव। शुक्रः=दीप्यमानः। समिधानः=संदीपयन्। पुनः। आहुतः=सर्वैस्तर्पितो भवति ॥१९॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - And that sun upto the regions of heaven radiates the light and, shining pure and bright, is invoked, invited and honoured as the holy fire.