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तं वो॒ वाजा॑नां॒ पति॒महू॑महि श्रव॒स्यव॑: । अप्रा॑युभिर्य॒ज्ञेभि॑र्वावृ॒धेन्य॑म् ॥

English Transliteration

taṁ vo vājānām patim ahūmahi śravasyavaḥ | aprāyubhir yajñebhir vāvṛdhenyam ||

Pad Path

तम् । वः॒ । वाजा॑नाम् । पति॑म् । अहू॑महि । श्र॒व॒स्यवः॑ । अप्रा॑युऽभिः । य॒ज्ञेभिः॑ । व॒वृ॒धेन्य॑म् ॥ ८.२४.१८

Rigveda » Mandal:8» Sukta:24» Mantra:18 | Ashtak:6» Adhyay:2» Varga:18» Mantra:3 | Mandal:8» Anuvak:4» Mantra:18


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SHIV SHANKAR SHARMA

पुनः वही विषय आ रहा है।

Word-Meaning: - हे मनुष्यों ! (श्रवस्यवः) कीर्ति और अन्न इत्यादि वस्तु की कामना करनेवाले हम उपासकगण (वः) तुम्हारे और हमारे और सबके (पतिम्) पालक उस परमात्मा की (अहूमहि) स्तुति करते हैं, जो (वाजानाम्) समस्त सम्पत्तियों और ज्ञानों का (पतिम्) पति है और जिसको (अप्रायुभिः) प्रमादरहित पुरुष (यज्ञेभिः) यज्ञों से (वावृधेन्यम्) बढ़ाते हैं, उसकी कीर्ति को गाते हैं ॥१८॥
Connotation: - उसी को चारों तरफ पूज रहे हैं, विद्वान् या मूर्ख, यज्ञों के द्वारा उसी का महत्त्व दिखला रहे हैं ॥१८॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'शक्तियों के स्वामी- यज्ञों से वर्धनीय' प्रभु

Word-Meaning: - [१] (श्रवस्यवः) = ज्ञान व यश की कामनावाले हम (तम्) = उस (वः) = तुम सब के (वाजानाम्) = बलों के (पतिम्) = स्वामी प्रभु को (अहूमहि) = पुकारते हैं। प्रभु हमारी सब इन्द्रियों के बल का वर्धन करके हमारे ज्ञान व शक्ति का वर्धन करते हैं। इस प्रकार हमारा जीवन यशस्वी बनता है। [२] हम उस प्रभु को पुकारते हैं जो (अप्रायुभिः) = प्रमाद से रहित (यज्ञेभिः) = यज्ञों से (वावृधेन्यम्) = वर्धनीय हैं। जब हम प्रमादशून्य होकर यज्ञों में प्रवृत्त होते हैं, तो प्रभु का प्रकाश हमारे में निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होता है।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु सब शक्तियों के स्वामी हैं। यज्ञों के द्वारा प्रभु का प्रकाश हमारे में होता है। इस प्रभु को ज्ञानी व यशस्वी बनने के लिये हम पुकारते हैं।
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SHIV SHANKAR SHARMA

पुनस्तदनुवर्तते।

Word-Meaning: - श्रवस्यवः=कीर्त्त्यन्नकामा वयमुपासकाः। हे मनुष्याः ! वः=युष्माकमस्माकं सर्वेषाञ्च। पतिं तमिन्द्रम्। अहूमहि=आह्वयामः। कीदृशम्। वाजानां पतिम्। अप्रायुभिः=प्रमादरहितैः पुरुषैः। यज्ञेभिः=यज्ञैश्च। वावृधेन्यम्=वर्धनीयञ्च ॥१८॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O people we, seekers of honour and fame, invoke and adore the protector and promoter of your food, energies and victories, by assiduous congregations of yajna and thereby exalt the splendour and glory of the lord supreme.