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एह हरी॑ ब्रह्म॒युजा॑ श॒ग्मा व॑क्षत॒: सखा॑यम् । गी॒र्भिः श्रु॒तं गिर्व॑णसम् ॥

English Transliteration

eha harī brahmayujā śagmā vakṣataḥ sakhāyam | gīrbhiḥ śrutaṁ girvaṇasam ||

Pad Path

आ । इ॒ह । हरी॒ इति॑ । ब्र॒ह्म॒ऽयुजा॑ । श॒ग्मा । व॒क्ष॒तः॒ । सखा॑यम् । गीः॒ऽभिः । श्रु॒तम् । गिर्व॑णसम् ॥ ८.२.२७

Rigveda » Mandal:8» Sukta:2» Mantra:27 | Ashtak:5» Adhyay:7» Varga:22» Mantra:2 | Mandal:8» Anuvak:1» Mantra:27


SHIV SHANKAR SHARMA

परमात्मदर्शन किस रीति से होता है, यह इससे उपदेश देते हैं।

Word-Meaning: - (गीर्भिः+श्रुतम्) जिसको परम्परा से ऋषि-मुनियों के वचनों द्वारा सुनते आये हैं। उसे न किन्होंने देखा और न सुना, परन्तु (गिर्वणसम्) जो स्वयं आदिसृष्टि में वाणी का प्रदाता है और (सखायम्) सर्व प्राणियों का मित्रस्वरूप है, उस महेश को (इह) इस संसार में (हरी) परस्पर हरणशील स्थावर और जङ्गम संसाररूप दो घोड़े (आ+वक्षतः) अच्छी तरह से प्रकाशित करते हैं। वे हरि कैसे हैं (ब्रह्मयुजा) ब्रह्म=चित् शक्ति से संयुक्त अर्थात् जिनमें परमात्मशक्ति विद्यमान हैं तथा (शग्मा) परमसुखकारी हैं ॥२७॥
Connotation: - मूर्तवस्तुवत् वह कदापि प्रत्यक्ष नहीं होता। परम्परा से वह केवल सुना जाता है, उसको किन्हींने देखा नहीं, क्योंकि वह इन्द्रियों से अदृश्य है। तब क्या उसके दर्शन के लिये यत्न भी न किया जाय, ऐसा नहीं। ये उसकी विभूतियाँ उसको प्रकाशित करती हैं, इनमें ही वह विद्यमान है। इनमें ही वह अन्वेष्ट्य है। इसी कारण ये विभूतियाँ परस्पर कल्याणकारिणी हैं। इनके कल्याणकारित्व को भी हम लोग नहीं देखते, क्योंकि चित्त विक्षिप्त हो रहा है ॥२७॥

ARYAMUNI

अब यज्ञस्थान को प्राप्त ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी का परमात्मोपदेश करना कथन करते हैं।

Word-Meaning: - (ब्रह्मयुजा) परमात्मा के साथ सम्बन्ध रखनेवाले (शग्मा) लोक के सुखजनक (हरी) ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी (इह) मेरे यज्ञ में (सखायं) सबके मित्र (श्रुतं) प्रसिद्ध (गिर्वणसं) वाणियों द्वारा भजनीय परमात्मा को (गीर्भिः) वाणियों से (आवक्षतः) आवाहित करें ॥२७॥
Connotation: - परमात्मा की आज्ञा पालन करनेवाले तथा संसार को सुख का मार्ग विस्तृत करनेवाले ज्ञानयोगी और कर्मयोगी यज्ञ में आकर वेदवाणियों द्वारा उस प्रभु की उपासना करते हुए सब जिज्ञासुजनों को परमात्मा की आज्ञा पालन करने का उपदेश करते हैं कि हे जिज्ञासुओ ! तुम उस परमात्मा की उपासना तथा आज्ञापालन करो, जो सबको मित्रता की दृष्टि से देखता है, जैसा कि “मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्” इत्यादि मन्त्रों में वर्णन किया है कि सर्वमित्र परमात्मा की उपासना करता हुआ प्रत्येक पुरुष उसी की आज्ञापालन में तत्पर रहे ॥२७॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

ब्रह्म-युजा-शग्मा-हरी

Word-Meaning: - [१] (इह) = इस जीवन में (हरी) = ये हमारे इन्द्रियाश्व (सखायम्) = उस मित्र प्रभु को (आवक्षतः) = प्राप्त कराते हैं। वे इन्द्रियाश्व जो (ब्रह्मयुजा) = ज्ञान के साथ सम्पर्क को करनेवाले हैं और (शग्मा) = [शग्म इति कर्म नाम नि० २।१] यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त होनेवाले हैं। और इन यज्ञादि कर्मों के द्वारा सुख प्राप्त करानेवाले होते हैं [शग्म इति सुख नाम नि० ३। ६] । ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्ति में लगी रहें और इसी प्रकार कर्मेन्द्रियाँ यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त रहें तो मनुष्य प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर चल रहा होता है। [२] ये इन्द्रियाश्व उस सखा को प्राप्त कराते हैं, जो (गीर्भिः श्रुतम्) = वेदवाणियों के द्वारा सुनाई पड़ते हैं 'ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्' सब ऋचाएँ उस प्रभु का ही तो वर्णन कर रही हैं। (गिर्वणसम्) = वे प्रभु इन ज्ञान वाणियों के द्वारा सम्भजनीय हैं। इन ज्ञानवाणियों में विचरनेवाला पुरुष ही प्रभु को पाता है।
Connotation: - भावार्थ- हम ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ज्ञान प्राप्ति में प्रवृत्त होकर तथा कर्मेन्द्रियों से यज्ञादि कर्मों को करते हुए प्रभु को प्राप्त करें।

SHIV SHANKAR SHARMA

परमात्मदर्शनं कया रीत्या भवतीत्यनयोपदिशति।

Word-Meaning: - गीर्भिः=वचनैः परम्परोक्तैः। श्रुतम्=न कैश्चिदपि कदापि प्रत्यक्षेण दृष्टं गृहीतं वा किन्तु श्रुतमेव। पुनः। गिर्वणसम्=आदिसृष्टौ गिरां वाणीनां वनसं संविभक्तारं प्रदातारम्। ईदृशं सखायं=सर्वेषां मित्रं महेशम्। इह=संसारद्रष्टॄणां समक्षे। हरी=परस्परहरणशीलौ स्थावरजङ्गमात्मकौ संसारौ। आवक्षतः=आवहत आनयतः प्रकाशयत इत्यर्थः। कीदृशौ हरी। ब्रह्मयुजा=ब्रह्मयुजौ ब्रह्मणा चिच्छक्त्या संयुक्तौ। तथा। शग्मा=शग्मौ सुखकरौ ॥२७॥

ARYAMUNI

अथ यज्ञस्थौ ज्ञानयोगिकर्मयोगिनौ परमात्मानमुपदिशतामिति कथ्यते।

Word-Meaning: - (ब्रह्मयुजा) परमात्मना सहकृतसम्बन्धौ (शग्मा) लोकानां सुखजनकौ (हरी) ज्ञानयोगिकर्मयोगिनौ (इह) मम यज्ञे (सखायं) हितकारकं (श्रुतं) प्रसिद्धं (गिर्वणसं) गीर्भिर्भजनीयं परमात्मानं (गीर्भिः) वाणीभिः (आवक्षतः) आवाहयताम् ॥२७॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Let the brave veterans of knowledge and yajnic karma, dedicated to Veda Brahma and humanity, with holy songs of divinity, invoke the most venerable and celebrated lord here on the vedi as our friend and companion.