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प्र॒शंस॑मानो॒ अति॑थि॒र्न मि॒त्रियो॒ऽग्नी रथो॒ न वेद्य॑: । त्वे क्षेमा॑सो॒ अपि॑ सन्ति सा॒धव॒स्त्वं राजा॑ रयी॒णाम् ॥

English Transliteration

praśaṁsamāno atithir na mitriyo gnī ratho na vedyaḥ | tve kṣemāso api santi sādhavas tvaṁ rājā rayīṇām ||

Pad Path

प्र॒ऽशंस॑मानः । अति॑थिः । न । मि॒त्रियः॑ । अ॒ग्निः । रथः॑ । न । वेद्यः॑ । त्वे॒ इति॑ । क्षेमा॑सः । अपि॑ । स॒न्ति॒ । सा॒धवः॑ । त्वम् । राजा॑ । र॒यी॒णाम् ॥ ८.१९.८

Rigveda » Mandal:8» Sukta:19» Mantra:8 | Ashtak:6» Adhyay:1» Varga:30» Mantra:3 | Mandal:8» Anuvak:3» Mantra:8


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SHIV SHANKAR SHARMA

अग्नि नाम से परमात्मा की स्तुति कहते हैं।

Word-Meaning: - हे मनुष्यों ! (प्रशंसमानः) प्रशस्त (अतिथिः+न) अतिथि जैसे वह (अग्निः) परमात्मा (मित्रियः) मित्रों का हितकारी होता है, वह (रथः+न) देवरथ सूर्य्यादि के समान (वेद्यः) ज्ञातव्य है। हे भगवन् ! (अपि) और (त्वे) तुझमें (क्षेमासः) निवास करनेवाले (साधवः+सन्ति) साधु=परहितसाधक होते हैं, (त्वम्) तू (रयीणाम्) धनों का (राजा) राजा है ॥८॥
Connotation: - हे मनुष्यों ! उस सर्वान्तर्यामी परमात्मा को ही अपना मित्र बनाओ। जो शुभाचरण में रत रहते हैं, जो उसकी आज्ञा को पालते हैं, वे उसके कृपापात्र होते हैं ॥८॥
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (अग्निः) परमात्मा (अतिथिः, न) अतिथि के समान (प्रशंसमानः) प्रशंसनीय (मित्रियः) प्राणियों का हितकारक (रथः, न, वेद्यः) रथ के समान प्राप्तव्य है, हे परमात्मन् ! (त्वयि) आप में (साधवः, क्षेमासः) साधक मङ्गल (अपिसन्ति) निश्चय रहते हैं (त्वम्) आप (रयीणाम्) धनों के (राजा) स्वामी हैं ॥८॥
Connotation: - अतिथि का सादृश्य देकर इस मन्त्र में यह व्यक्त किया है कि अतिथि को भी परमात्मा के समान पूज्य मानना चाहिये और रथ का साहाय्य इसलिये दिया है कि जैसे किसी यान्त्रिक को रथ का प्रयोजन प्रथम ही होता है, इसी प्रकार संसारयात्रा करनेवाले को रथरूप परमात्मा का आश्रय लेना परमावश्यक है, क्योंकि वह पूजनीय, सबका मित्र, मङ्गलमय और सब धनों का स्वामी है ॥८॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

अतिथिर्न, रथो न

Word-Meaning: - [१] (प्रशंसमान:) = प्रकर्षेण शंसन, ज्ञानोपदेश करते हुए (अतिथिः न) = अतिथि की तरह आप (मित्रियः) = इन स्नेही स्तोताओं के हित करनेवाले हैं। (अग्नि:) = अग्रेणी होते हुए आप (रथः न) = रथ के समान (वेद्य:) = जानने योग्य हैं। रथ जैसे लक्ष्य स्थान पर ले जाता है, इसी प्रकार आप हमें लक्ष्य-स्थान पर ले जानेवाले हैं। [२] (त्वे) = आप में (क्षेमासः) = [क्षि विवासगत्योः] निवास व गति करनेवाले (अपि) = भी (साधवः सन्ति) = कार्यों को सिद्ध करनेवाले होते हैं, प्रभु स्मरणपूर्वक गति करनेवाले व्यक्ति साधुत्व को प्राप्त करते हैं। (त्वम्) = आप (रयीणां राजा) = सब धनों व ऐश्वर्यों को स्वामी हैं।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु अतिथि के समान ज्ञानोपदेश करते हुए हमारा हित करते हैं। रथ के समान हमें लक्ष्य-स्थान पर पहुँचानेवाले हैं। प्रभु में निवास करनेवाला साधुत्व को प्राप्त करता है। प्रभु ही सब धनों के स्वामी हैं।
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SHIV SHANKAR SHARMA

अग्निः स्तूयते।

Word-Meaning: - हे मनुष्याः ! प्रशंसमानः=प्रशस्यमानः। “अत्र व्यत्ययेन कर्मणि कर्त्तृप्रयोगः”। अतिथिर्न=अतिथिरिव। सोऽग्निः=परमात्मा। मित्रियः=मित्राणां हितो भवति। रथो न=रथ इव=देवानां रथ इव=रमणीयः सूर्य्य इव। वैद्यः=विज्ञेयो भवति। हे अग्ने ! अपि चार्थः। अपि च। त्वे=त्वयि। साधवः=साधका जनाः। क्षेमासः=कल्याणवन्तो भवन्ति। यद्वा। त्वे क्षेमासस्त्वयि निवसन्तः पुरुषाः साधवः। सन्ति=भवन्ति। त्वं रयीणाम्=धनानां राजासि ॥८॥
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (अग्निः) परमात्मा (अतिथिः, न) अतिथिरिव (प्रशंसमानः) प्रशस्यमानः (मित्रियः) मित्राणां हितः (रथः, न, वेद्यः) रथ इव प्राप्यः चास्ति (त्वे) त्वयि (साधवः, क्षेमासः, अपिसन्ति) साधकाः क्षेमा अपि विद्यन्ते (त्वम्, रयीणाम्, राजा) त्वं च धनानां राजासि ॥८॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni is worthy of praise and admiration as a friendly guest of honour and worthy to be known as a saviour like a chariot leading to cherished destinations. Abiding in you and strengthened by you, O lord, dedicated practitioners rise to be men of perfect success in peace and bliss since you are the ruler and controller of all forms of the wealth of existence.