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तस्येदर्व॑न्तो रंहयन्त आ॒शव॒स्तस्य॑ द्यु॒म्नित॑मं॒ यश॑: । न तमंहो॑ दे॒वकृ॑तं॒ कुत॑श्च॒न न मर्त्य॑कृतं नशत् ॥

English Transliteration

tasyed arvanto raṁhayanta āśavas tasya dyumnitamaṁ yaśaḥ | na tam aṁho devakṛtaṁ kutaś cana na martyakṛtaṁ naśat ||

Pad Path

तस्य॑ । इत् । अर्व॑न्तः । रं॒ह॒य॒न्ते॒ । आ॒शवः॑ । तस्य॑ । द्यु॒म्निऽत॑मम् । यशः॑ । न । तम् । अंहः॑ । दे॒वऽकृ॑तम् । कुतः॑ । च॒न । न । मर्त्य॑ऽकृतम् । न॒श॒त् ॥ ८.१९.६

Rigveda » Mandal:8» Sukta:19» Mantra:6 | Ashtak:6» Adhyay:1» Varga:30» Mantra:1 | Mandal:8» Anuvak:3» Mantra:6


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SHIV SHANKAR SHARMA

इस ऋचा से अग्निहोत्रादि कर्मों का फल कहते हैं।

Word-Meaning: - (तस्य) उस अग्निहोत्रादि कर्मकर्त्ता पुरुष के (आशवः) शीघ्रगामी (अर्वन्तः) घोड़े (रंहयन्ते) संग्राम में वेग करते हैं और (यस्य) उसी की (द्युम्नितमम्) अतिशय प्रकाशवान् (यशः) कीर्ति होती है। (तम्) उसको (कुतश्चन) किसी भी कारण से (देवकृतम्) देवों से प्रेरित=इन्द्रियकृत (अंहः) पाप (न+नशत्) नहीं प्राप्त होता है और (न+मर्त्यकृतम्) मनुष्यकृत पाप भी उसको प्राप्त नहीं होता ॥६॥
Connotation: - जो शुभकर्म में सदा आसक्त हैं, वे कदापि अशुभ कर्म में प्रवृत्त नहीं होते, अतः वे न इन्द्रियविवश होते और न ये दुर्जनों के जाल में ही फँसते हैं ॥६॥
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ARYAMUNI

अब उक्त यज्ञों के कर्त्ता को फल कथन करते हैं।

Word-Meaning: - (तस्य, इत्) उसी के (आशवः, अर्वन्तः) शीघ्रगामी अश्व (रंहयन्ते) वेग से दौड़ते हैं (तस्य, द्युम्नितमम्, यशः) उसी को दिव्यमय यश प्राप्त होता है (तम्) उसको (कुतश्चन) कहीं भी (देवकृतम्, अंहः, न) देवों से किया हुआ पाप (नशत्) व्याप्त नहीं होता (न, मर्त्यकृतम्) न मनुष्यकृत ही व्याप्त होता है ॥६॥
Connotation: - जो पूर्वोक्त यज्ञकर्ता है, उसको यश के सहित अन्नादि पदार्थ प्राप्त होते हैं और देवकृत=नेता लोगों के प्रमाद से किया गया अथवा मर्त्यकृत=साधारण मनुष्यद्वारा आया हुआ पाप उसको बाधित नहीं करता अर्थात् जो पुरुष नियमपूर्वक उक्त तीनों यज्ञों का अनुष्ठान करता है, उसको यश प्राप्त होता और गौ, अश्व तथा नाना प्रकार के धनों से सुभूषित होता है और देवकृत तथा मनुष्यकृत पापरूप मल पङ्क से निपायमान नहीं होता, अतएव ऐश्वर्य की कामनावाले सब मनुष्यों को उक्त यज्ञों का अनुष्ठान सदैव करना चाहिये ॥६॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

आधिदैविक व आधिभौतिक कष्टों से दूर

Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार जो प्रभु के प्रति अपना अर्पण करता है, (तस्य इत्) = उसके ही (आशवः) = शीघ्रता से कार्यों में व्याप्त होनेवाले (अर्वन्तः) = इन्द्रियाश्व (रंहयन्ते) = कर्त्तव्य कर्मों में तीव्र गतिवाले होते हैं। (तस्य) = उसी का (यशः) = यश (द्युम्नितमम्) = अधिक से अधिक दीप्तिवाला होता है। इसका जीवन यशस्वी व ज्ञान की दीप्तिवाला होता है। [२] (तम्) = इस प्रभु के उपासक को (कुतश्चन) = कहीं से भी (देवकृतम्) = सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, विद्युत् आदि देवों से उत्पन्न हुआ हुआ (अंहः) = कष्ट (नशत्) = नहीं प्राप्त होता और (न) = न ही (मर्त्यकृतम्) = मनुष्यों से उत्पन्न हुआ-हुआ कष्ट प्राप्त होता है। अर्थात् यह उपासक प्राकृतिक जगत् व जैविक जगत् की अनुकूलता को प्राप्त करता है और शान्त सुखी जीवनवाला होता है। ऐसी स्थिति में सब इन्द्रियाँ व बुद्धि अपना-अपना कार्य ठीक से करती हैं। सो इस उपासक को अध्यात्म कष्टों से भी पीड़ा नहीं प्राप्त होती । त्रिविध कष्टों से ऊपर उठकर यह प्रभु के अधिकाधिक समीप होता जाता है।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु के प्रति अपना अर्पण करनेवाले को न आधिदैविक कष्ट प्राप्त होते हैं, न आधिभौतिक। यह उत्तम इन्द्रियों व बुद्धिवाला बनकर अध्यात्म कष्टों से भी ऊपर उठ जाता है।
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SHIV SHANKAR SHARMA

अग्निहोत्रादिकर्मफलमाह।

Word-Meaning: - तस्येत्=पूर्वोक्तस्य अग्निहोत्रादिकर्मकर्तुः पुरुषस्यैव। इद् एवार्थः। आशवः=शीघ्रगामिनः। अर्वन्तः=अश्वाः। संग्रामे रंहयन्ते=वेगं कुर्वन्ति। पुनः। तस्यैव। द्युम्नितमम्=प्रकाशवत्तमम्। यशः=कीर्त्तिर्भवति। तथा। तं पुरुषम्। कुतश्चन=कस्मादपि कारणात्। देवकृतम्=देवैः प्रेरितम्। अंहः=पापम्। न+नशत्=न प्राप्नोति=न व्याप्नोति। नश व्याप्तौ। अपि च। मर्त्यकृतं पापं न नशत् ॥६॥
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ARYAMUNI

अथोक्तं यज्ञकर्तुर्फलमुच्यते।

Word-Meaning: - (तस्य, इत्) तस्यैव (आशवः, अर्वन्तः) आशुगामिनोऽश्वाः (रंहयन्ते) धावन्ति (तस्य, द्युम्नितमम्, यशः) तस्य दिव्यतमं यशो भवति (तम्) तं जनम् (कुतश्चन) कुतोऽपि (देवकृतम्, अंहः, न) देवैः कृतं पापं न (नशत्) व्याप्नोति (न, मर्त्यकृतम्) न मनुष्यकृतम् व्याप्नोति ॥६॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - His horses speed on at the fastest and hasten him to victory. His honour and fame shine the brightest. Whatever he does in honour of the divinities or in service to mortal humanity, sin and pride never touch him nor does it pollute his action.