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ऊ॒र्जो नपा॑तं सु॒भगं॑ सु॒दीदि॑तिम॒ग्निं श्रेष्ठ॑शोचिषम् । स नो॑ मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ सो अ॒पामा सु॒म्नं य॑क्षते दि॒वि ॥

English Transliteration

ūrjo napātaṁ subhagaṁ sudīditim agniṁ śreṣṭhaśociṣam | sa no mitrasya varuṇasya so apām ā sumnaṁ yakṣate divi ||

Pad Path

ऊ॒र्जः । नपा॑तम् । सु॒ऽभग॑म् । सु॒ऽदीदि॑तिम् । अ॒ग्निम् । श्रेष्ठ॑ऽशोचिषम् । सः । नः॒ । मि॒त्रस्य॑ । वरु॑णस्य । सः । अ॒पाम् । आ । सु॒म्नम् । य॒क्ष॒ते॒ । दि॒वि ॥ ८.१९.४

Rigveda » Mandal:8» Sukta:19» Mantra:4 | Ashtak:6» Adhyay:1» Varga:29» Mantra:4 | Mandal:8» Anuvak:3» Mantra:4


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SHIV SHANKAR SHARMA

उसकी महिमा दिखलाते हैं।

Word-Meaning: - हम उपासकगण (ऊर्जः) विज्ञानबलयुक्त पुरुष को (नपातम्) न गिरानेवाले किन्तु पालन करनेवाले (सुभगम्) शोभनैश्वर्य्ययुक्त (सुदीदितिम्) सर्वत्र सुप्रकाशक (श्रेष्ठशोचिषम्) सर्वोत्तमतेजस्क (अग्निम्) परमात्मा की स्तुति करते हैं (सः) वह (मित्रस्य) दिन का (वरुणस्य) और रात्रि का (सुम्नम्) सुख (नः) हमको (दिवि) व्यवहार के लिये (यक्षते) देता है और (अपाम्) जल का भी सुख वही (आ+यक्षते) देता है ॥४॥
Connotation: - जैसे हम विद्वान् उस परमात्मा की उपासना करते हैं, हे मनुष्यों ! आप भी वैसे ही उसी को पूजो ॥४॥
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (ऊर्जः) बल के (नपातम्) रक्षक (सुभगम्) सुन्दर ऐश्वर्यवाले (सुदीदितिम्) सुन्दर दीप्तिवाले (श्रेष्ठशोचिषम्) श्रेष्ठतेजवाले (अग्निम्) परमात्मा को स्तुतिद्वारा परिचरण करते हैं, क्योंकि (सः) वह (नः) हमारे (मित्रस्य) स्नेह करनेवाले नेता और (वरुणस्य) विघ्नवारक नेता के (सः) वही (दिवि) द्युलोक में (अपाम्) जलों के (सुम्नम्) सुख को (आयक्षते) सम्यक् देता है ॥४॥
Connotation: - वह परमात्मा मित्र=सब प्रजाओं के दुःखनाश का उपाय करनेवाला नेता है और जो वरुण=राजसम्बन्धी होकर विघ्ननाशी नेता है। इन दोनों प्रकार के नेताओं का अनुकूल होना, इनकी अनुकूलता से सुखलाभ होना तथा जलादि भौतिक पदार्थों का सुख उसी परमात्मा की अनुकूलता से होता है, इससे उसका अनुकूल करना परमावश्यक है ॥४॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'मित्र वरुण व आपः' का सुख

Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार हम उस प्रभु का [ववृमहे] वरण करते हैं, जो (ऊर्जः नपातं) = शक्ति को न गिरने देनेवाले हैं। (सुभगम्) = शोभन धनवाले हैं। (सुदीदितिम्) = उत्तम दीप्ति से युक्त हैं तथा (श्रेष्ठशोचिषम्) = अति प्रशस्त तेजवाले हैं। [२] (सः) = वे प्रभु (नः) = हमें (मित्रस्य) = स्नेह की देवता के तथा (वरुणस्य) = निर्देषता की देवता के (सुम्नम्) = सुख को (यक्षते) = देते हैं [खज् दाने] । हमें स्नेह व निर्देषतावाला बनाकर प्रीतियुक्त करते हैं। (सः) = वे प्रभु ही (दिवि) = मस्तिष्करूप द्युलोक के निमित्त (अपां सुम्नम्) = [आप: रेतो भूत्वा० ] रेतःकणों के सुख को प्राप्त कराते हैं। सुरक्षित रेतःकण ही हमारी ज्ञानाग्नि का ईंधन बनते हैं और ज्ञानाग्नि को दीप्त करते हैं। दीप्त ज्ञानाग्नि ही जीवन के सब वास्तविक सुखों के मूल में है।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु हमारी शक्ति को नष्ट नहीं होने देते। शोभन धन व दीप्तिवाले वे प्रभु हमें तेजस्वी बनाते हैं। प्रभु का उपासक सब के प्रति स्नेहवाला व निद्वेष होता है। यह शक्तिकणों का रक्षण करके दीप्त ज्ञानाग्निवाला बनता है।
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SHIV SHANKAR SHARMA

तदीयं महिमानं दर्शयति।

Word-Meaning: - वयमुपासकाः। ऊर्जः=विज्ञानबलवतः पुरुषस्य। नपातम्=न पातयितारं किन्तु पातारम्। सुभगम्=शोभनैश्वर्य्यम्। सुदीदितिम्=सुष्ठु दीपयितारम्। श्रेष्ठशोचिषम्=सर्वोत्तमतेजस्कमग्निं परमात्मानं ब्रह्माख्यम्। स्तुम इति शेषः। स ईशः। नोऽस्मभ्यम्। मित्रस्य=दिनस्य। वरुणस्य=रात्रेः। सुम्नम्। दिवि=व्यवहारे। आ+यक्षते=सुखम् ददाति। पुनः। अपाम्=जलानां सुम्नम् सुखम्। स एव सर्वेभ्यो। यक्षते=ददाति ॥४॥
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (ऊर्जः) बलस्य (नपातम्) रक्षितारम् (सुभगम्) स्वैश्वर्यम् (सुदीदितिम्) सुदीप्तिम् (श्रेष्ठशोचिषम्) श्रेष्ठतेजस्कम् (अग्निम्) परमात्मानम् स्तौमि (सः) स हि (नः) अस्माकम् (मित्रस्य) स्नेहं कुर्वतो नेतुः (वरुणस्य) विघ्नवारकस्य नेतुः (सः) स एव (दिवि) द्युलोके (अपाम्) जलानाम् (सुम्नम्) सुखम् (आयक्षते) आकरोति ॥४॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - We worship Agni, protector and promoter of energy and men of energy, lord of grandeur and glory and the holy refulgence of nature that shines bright with the highest flames of fire and light. In the light and fire of cosmic yajna, He is the giver of joy in the light of day and the bliss of peace in the night, and He is the giver of the nectar of pleasure in the liquid flow of water and the dynamics of karmic flow.