'प्रयियु, वयियु, सुवास्तु'
Word-Meaning: - [१] (उत) = और (मे) = मेरे लिये वे प्रभु (प्रयियोः) = जीवनयात्रा के लिये आवश्यक धन के [प्रयायते अनेन] प्रणेता प्राप्त करानेवाले हैं। (वयियोः) = [ऊयते येन] जिससे कर्म तन्तु का विस्तार किया जाता है उस ज्ञानरूप वस्त्र के (प्रणेता) = देनेवाले हैं। तथा (सुवास्त्वाः) = उत्तम शरीर गृह के देनेवाले हैं। वे (तिसृणाम्) = तीनों (सप्ततीनाम्) = सर्पणशील जीवन में निरन्तर बढ़नेवाले काम, क्रोध व लोभ के (अधि तुग्वनि) = आधिक्येन हिंसन के निमित्त प्रभु ही 'वयियु, सुवास्तु व प्रयियु' के देनेवाले हैं। वे कर्मतन्तु के विस्तारक ज्ञान को देकर प्रभु मुझे 'काम' से ऊपर उठाते हैं। उत्तम निवास के हेतुभूत इस शरीर गृह को देकर 'क्रोध' से दूर करते हैं तथा 'प्रयियु'- आवश्यक धन को देकर 'लोभ' से परे करते हैं। [२] वे प्रभु ही (श्यावः) = [ श्यैङ् गतौ] सब कार्यों के संचालक हैं। (भुवद्वसुः) = सब वसुओं के भावयिता [उत्पादक] हैं तथा (दियानां पतिः) = दानशील पुरुषों के रक्षक हैं। प्रभु का इस प्रकार स्मरण करते हुए हम इन तीनों सप्ततियों का तीनों सर्पणशील 'काम-क्रोध- लोभ' का शमन कर सकें।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु ही धन-कर्मतन्तु विस्तारक ज्ञान तथा उत्तम शरीर गृह को देकर हमें काम- क्रोध-लोभ से दूर करते हैं। हम प्रभु का इस रूप में स्मरण करें, कि प्रभु ही सब कार्यों के सञ्चालक, धनों के उत्पादक व दानों के स्वामी हैं। अगले सूक्त ' में 'सोभरि' मरुतों का स्तवन करते हैं। मरुत् ' अध्यात्म' में प्राण हैं, 'अधिदैवत' रूप में ये वायु हैं, 'आधिभौतिक' क्षेत्र में ये सैनिक हैं-