Go To Mantra
Viewed 433 times

इन्द्रा॑य॒ सु म॒दिन्त॑मं॒ सोमं॑ सोता॒ वरे॑ण्यम् । श॒क्र ए॑णं पीपय॒द्विश्व॑या धि॒या हि॑न्वा॒नं न वा॑ज॒युम् ॥

English Transliteration

indrāya su madintamaṁ somaṁ sotā vareṇyam | śakra eṇam pīpayad viśvayā dhiyā hinvānaṁ na vājayum ||

Pad Path

इन्द्रा॑य । सु । म॒दिन्ऽत॑मम् । सोम॑म् । सो॒त॒ । वरे॑ण्यम् । श॒क्रः । ए॒ण॒म् । पी॒प॒य॒त् । विश्व॑या । धि॒या । हि॒न्वा॒नम् । न । वा॒ज॒ऽयुम् ॥ ८.१.१९

Rigveda » Mandal:8» Sukta:1» Mantra:19 | Ashtak:5» Adhyay:7» Varga:13» Mantra:4 | Mandal:8» Anuvak:1» Mantra:19


SHIV SHANKAR SHARMA

सब शुभकर्म परमात्मा को समर्पित करना उचित है, यह उपदेश इससे दिया जाता है।

Word-Meaning: - हे मनुष्यो ! आप (मदिन्तमम्) अतिशय आनन्दप्रद तथा (वरेण्यम्) अतिशय श्रेष्ठ (सोमम्) शुभकर्म (सु+सोत) अच्छे प्रकार करें, वह (इन्द्राय) परमात्मा के लिये ही करें अर्थात् अभिमान और अहङ्कार को त्याग कर्मफलों की आकाङ्क्षा न कर उस महान् देव की प्रसन्नता के लिये ही शुभकर्म करें, क्योंकि वह (शक्रः) सर्वशक्तिमान् है, वह (एनम्) इस (वाजयुम्) ज्ञानीजन को (पीपयत्) प्रत्येक सांसारिक कार्य में बढ़ाता है। किसको बढ़ाता है, सो कहते हैं−(विश्वया) जो सर्व (धिया) ज्ञान से वा निखिल क्रिया द्वारा सर्वभाव से (हिन्वानम्) परमात्मा में अपने आत्मा को प्रेरित करता है ॥१९॥
Connotation: - कपटादि दोषरहित ईश्वरविश्वासी धर्म्माचारी मनुष्यों का कदापि भी अधःपात नहीं करता, यह देख शुभकर्म मनुष्य करें ॥१९॥

ARYAMUNI

अब कर्मयोगी के प्रयत्न की सफलता कथन करते हैं।

Word-Meaning: - हे उपासको ! (इन्द्राय) कर्मयोगित्व सम्पादन करने के लिये (मदिन्तमं) आनन्दस्वरूप (वरेण्यं) उपासनीय (सोमं) परमात्मा को (सु, सोत) सम्यक् सेवन करो, क्योंकि (शक्रः) सर्वशक्तिमान् परमात्मा (विश्वया, धिया) अनेक क्रियाओं से (हिन्वानं) प्रसन्न करते हुए (वाजयुम्) बल चाहनेवाले (एनं) इस कर्मयोगी को (न) सम्प्रति (पीपयत्) फलप्रदान द्वारा सम्पन्न करते हैं ॥१८॥
Connotation: - इस मन्त्र में यह उपदेश किया गया है कि हे उपासक लोगो ! तुम कर्मयोगी बनने के लिये उस महानात्मा प्रभु से प्रार्थना करो, जो बल तथा अनेक प्रकार की क्रियाओं का देनेवाला है। भाव यह है कि कर्मयोगी ही संसार में सब प्रकार के ऐश्वर्य्य को प्राप्त होता और वही प्रतिष्ठित होकर मनुष्यजन्म के फलों को उपलब्ध करता है, इसलिये पुरुषों को कर्मयोगी बनने की परमात्मा से सदैव प्रार्थना करनी चाहिये ॥१९॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'प्रभु प्राप्ति, ज्ञान व शक्ति वर्धन'

Word-Meaning: - [१] (इन्द्राय) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु की प्राप्ति के लिये (सोमं सु सोत) = सोम को [वीर्य को] सम्यक् उत्पन्न करो, जो सोम (मदिन्तमम्) = मादयितृतम है, अधिक से अधिक उल्लास का जनक है और (वरेण्यम्) = वरणीय है, सम्भजनीय है । सोम के रक्षण के द्वारा ही प्रभु की प्राप्ति होती है। [२] (शक्रः) = वे सर्वशक्तिमान् प्रभु (एनम्) = इस सोम को (पीपयत्) = हमारे अन्दर आप्यायित करते हैं। उस सोम को आप्यायित करते हैं, जो (विश्वया धिया हिन्वानम्) = सम्पूर्ण ज्ञान से हमें प्रीणित करता है, (न) = और [न-च] (वाजयुम्) = हमारे साथ शक्ति को जोड़ता है । सोमरक्षण से ज्ञान व शक्ति का वर्धन होता है।
Connotation: - भावार्थ-उस प्रभु की प्राप्ति के लिये हम सोम का रक्षण करें। सुरक्षित सोम हमारे ज्ञान व बल का वर्धन करेगा।

SHIV SHANKAR SHARMA

सर्वाणि शुभानि कर्माणि परमात्मने समर्पयितव्यानीत्युपदिश्यते।

Word-Meaning: - हे मनुष्याः ! मदिन्तमं=मादयितृतममानन्दयितृतमं। वरेण्यं=श्रेष्ठं संभजनीयम्। सोमम्=आत्मप्रियं शुभं यज्ञम्। सु=शोभनरीत्या। सोत=सम्पादयत तमिन्द्राय समर्पयत। अभिमानमहंकारं च त्यक्त्वा कर्मफलानामाकाङ्क्षां विहाय तमेव महान्तं देवं प्रसादयितुं कर्माणि कुरुतेत्यर्थः। कस्मात्। यतः। स शक्रः=सर्वं कर्त्तुं यः शक्नोति स शक्रः। पुनः। य इन्द्रः। विश्वया=सर्वया। धिया=अग्निष्टोमादिलक्षणया क्रियया। हिन्वानं=जीवात्मानं परमात्मना सह योजयन्तं। वाजयुं=ज्ञानाभिलाषिणं=एनं यजमानम्। नेति निश्चयार्थीयः। निश्चयं यथा तथा। पीपयत्=वर्धयति समुन्नयति। तस्मात्कारणात् सर्वात्मना परमात्मा आराधनीय इत्यर्थः ॥१९॥

ARYAMUNI

अथ कर्मयोगिनः प्रयत्नसाफल्यं कथ्यते।

Word-Meaning: - हे उपासकाः ! (इन्दाय) कर्मयोगिने (मदिन्तमं) आह्लादकं (वरेण्यं) संभजनीयं (सोमं) परमात्मानं (सु, सोत) साधु उपासन्तां, किमर्थं तदाह−(शक्रः) सर्वकर्मसु शक्तः परमात्मा (विश्वया, धिया) विविधक्रियया (हिन्वानं) प्रीणयन्तं (वाजयुं) बलमिच्छन्तं (एनं) एनं कर्मयोगिनं (पीपयत्) वर्धयति सेव्यमानः (न) सम्प्रति ॥१९॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O celebrants of Indra, seekers of spiritual perfection, for the attainment of holiness of thought, karma and vision, extract the choicest, most exhilarating soma from life and offer it to Indra, spirit of the universe, and the lord omnipotent would bless this seeker of fulfilment calling upon the lord with universal intelligence and will for a life of perfect action.