Word-Meaning: - पदार्थ- (सः हि) = वह प्रभु ही (शुचिः) = पवित्र, (शतपत्रः) = शतदल कमल के समान उज्वल, निस्संङ्ग है (सः शुन्ध्युः) = वह सबको शुद्ध करनेवाला, (हिरण्य-वाशी:) = हित, रमणीय वेदवाणी से युक्त, (इषिरः) = सबके चाहने योग्य, (स्वः-साः) = सुखदाता है। (सः सु-आवेश:) = वह उत्तम रीति से विश्व में व्यापक, (ऋष्वः) = महान्, (सखिभ्यः) = अपने समान ख्याति, आत्मा नामवाले जीवों के लिये (पुरु आसुतिं) = बहुत-सा अन्न आदि ऐश्वर्य (करिष्ठ:) = उत्पन्न करनेवाला है, वही (बृहस्पतिः) = जगत्-पालक बृहस्पति है। ऐसा ही राष्ट्र का स्वामी भी हो। वह (शुचि:) = ईमानदार, शुद्ध हो(शतपत्र:) = सैकड़ों रथों का स्वामी, (शुन्ध्युः) = राज्य के कण्टकों का शोधक, (हिरण्य-वाशी:) = लोह आदि के चमकते शस्त्रास्त्रोंवाला, (इषिरः) = सेना का सञ्चालक, (स्वर्षा:) = शत्रुतापकारी अस्त्रों तथा प्रजा के सुखों का दाता, (सु-आवेश:) = सुखपूर्वक राष्ट्र में प्रविष्ट, (ऋष्वः) = महान् (सखिभ्यः पुरु आसुतिं करिष्ठः) = मित्रों के लिये ऐश्वर्य का उत्पादक हो।
Connotation: - भावार्थ - ईश्वर परम पवित्र है अतः उसकी उपासना करनेवाला उपासक भी पवित्र हो जाता है। वह प्रभु अपनी कल्याणमयी वेदवाणी प्रदान कर जीवों को परम सुख व सांसारिक ऐश्वर्य देता है।