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स हि शुचि॑: श॒तप॑त्र॒: स शु॒न्ध्युर्हिर॑ण्यवाशीरिषि॒रः स्व॒र्षाः । बृह॒स्पति॒: स स्वा॑वे॒श ऋ॒ष्वः पु॒रू सखि॑भ्य आसु॒तिं करि॑ष्ठः ॥

English Transliteration

sa hi śuciḥ śatapatraḥ sa śundhyur hiraṇyavāśīr iṣiraḥ svarṣāḥ | bṛhaspatiḥ sa svāveśa ṛṣvaḥ purū sakhibhya āsutiṁ kariṣṭhaḥ ||

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Pad Path

सः । हि । शुचिः॑ । श॒तऽप॑त्रः । सः । शु॒न्ध्युः । हिर॑ण्यऽवाशीः । इ॒षि॒रः । स्वः॒ऽसाः । बृह॒स्पतिः॑ । सः । सु॒ऽआ॒वे॒शः । ऋ॒ष्वः । पु॒रु । सखि॑ऽभ्यः । आ॒ऽसु॒तिम् । करि॑ष्ठः ॥ ७.९७.७

Rigveda » Mandal:7» Sukta:97» Mantra:7 | Ashtak:5» Adhyay:6» Varga:22» Mantra:2 | Mandal:7» Anuvak:6» Mantra:7


ARYAMUNI

Word-Meaning: - (सः, हि) वह परमात्मा निश्चय (शुचिः) शुद्ध है (शतपत्रः) सर्वशक्तिमान् है, (सः) वह परमात्मा (शुन्ध्युः) सबको शुद्ध करनेवाला है, (हिरण्यवाशीः) स्वर्णमयी वाणीवाला है “वाशीति वाङ्नामसु पठितम्”। निघण्टौ १, ११ ॥ (इषिरः) सर्वप्रिय (स्वर्षाः) आनन्द का दाता (बृहस्पतिः) कोटानुकोटि ब्रह्माण्डों का पति (स्वावेशः) सर्वाधार (ऋष्वः) दर्शनीय, इस प्रकार का परमात्मा (सखिभ्यः) अपने भक्तों, जिज्ञासुओं के लिये (पुरु) बहुत (आसुतिम्) ऐश्वर्य्य (करिष्ठः) करता है ॥७॥
Connotation: - उक्तगुणसम्पन्न परमात्मा अपने भक्तों को आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक तीनों तापों को मिटा कर अति ऐश्वर्य प्रदान करता है ॥७॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

परम पवित्र परमात्मा

Word-Meaning: - पदार्थ- (सः हि) = वह प्रभु ही (शुचिः) = पवित्र, (शतपत्रः) = शतदल कमल के समान उज्वल, निस्संङ्ग है (सः शुन्ध्युः) = वह सबको शुद्ध करनेवाला, (हिरण्य-वाशी:) = हित, रमणीय वेदवाणी से युक्त, (इषिरः) = सबके चाहने योग्य, (स्वः-साः) = सुखदाता है। (सः सु-आवेश:) = वह उत्तम रीति से विश्व में व्यापक, (ऋष्वः) = महान्, (सखिभ्यः) = अपने समान ख्याति, आत्मा नामवाले जीवों के लिये (पुरु आसुतिं) = बहुत-सा अन्न आदि ऐश्वर्य (करिष्ठ:) = उत्पन्न करनेवाला है, वही (बृहस्पतिः) = जगत्-पालक बृहस्पति है। ऐसा ही राष्ट्र का स्वामी भी हो। वह (शुचि:) = ईमानदार, शुद्ध हो(शतपत्र:) = सैकड़ों रथों का स्वामी, (शुन्ध्युः) = राज्य के कण्टकों का शोधक, (हिरण्य-वाशी:) = लोह आदि के चमकते शस्त्रास्त्रोंवाला, (इषिरः) = सेना का सञ्चालक, (स्वर्षा:) = शत्रुतापकारी अस्त्रों तथा प्रजा के सुखों का दाता, (सु-आवेश:) = सुखपूर्वक राष्ट्र में प्रविष्ट, (ऋष्वः) = महान् (सखिभ्यः पुरु आसुतिं करिष्ठः) = मित्रों के लिये ऐश्वर्य का उत्पादक हो।
Connotation: - भावार्थ - ईश्वर परम पवित्र है अतः उसकी उपासना करनेवाला उपासक भी पवित्र हो जाता है। वह प्रभु अपनी कल्याणमयी वेदवाणी प्रदान कर जीवों को परम सुख व सांसारिक ऐश्वर्य देता है।

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (सः, हि) स परमात्मा निश्चयं (शुचिः) शुद्धः (शतपत्रः) सर्वशक्तिमान् (सः, शुन्ध्युः) सर्वशोधकः (हिरण्यवाशीः) सुवर्णवाग् (इषिरः) सर्वप्रियः (स्वर्षाः) आनन्ददः (बृहस्पतिः) अखिलब्रह्माण्डशासनः (स्वावेशः) सर्वाधारः (ऋष्वः) दर्शनीयः, एवंभूतः सः (सखिभ्यः) स्वभक्तेभ्यः (पुरु) बहुतरम् (आसुतिम्) ऐश्वर्यं (करिष्ठः) करोतितराम् ॥७॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - That lord, Brhaspati, is pure, purifying and sanctifying, infinitely manifest in the countless leaves of the cosmic tree, golden sweet of word and voice in the Veda, ever dynamic in nature and ever rejoicing in the self. He is easy of access, being immanent in the universe and beatific, creating abundant peace, prosperity and joy for the devotees.