Go To Mantra
Viewed 394 times

उ॒भे यत्ते॑ महि॒ना शु॑भ्रे॒ अन्ध॑सी अधिक्षि॒यन्ति॑ पू॒रव॑: । सा नो॑ बोध्यवि॒त्री म॒रुत्स॑खा॒ चोद॒ राधो॑ म॒घोना॑म् ॥

English Transliteration

ubhe yat te mahinā śubhre andhasī adhikṣiyanti pūravaḥ | sā no bodhy avitrī marutsakhā coda rādho maghonām ||

Mantra Audio
Pad Path

उ॒भे इति॑ । यत् । ते॒ । म॒हि॒ना । शु॒भ्रे॒ । अन्ध॑सी॒ इति॑ । अ॒धि॒ऽक्षि॒यन्ति॑ । पू॒रवः॑ । सा । नः॒ । बो॒धि॒ । अ॒वि॒त्री । म॒रुत्ऽस॑खा । चोद॑ । राधः॑ । म॒घोना॑म् ॥ ७.९६.२

Rigveda » Mandal:7» Sukta:96» Mantra:2 | Ashtak:5» Adhyay:6» Varga:20» Mantra:2 | Mandal:7» Anuvak:6» Mantra:2


ARYAMUNI

Word-Meaning: - (शुभ्रे) हे पवित्र स्वभाववाली विद्ये ! (पूरवः) मनुष्य लोग तुम से (उभे) दो प्रकार के फल लाभ करते हैं, (यत्ते) तुम्हारे वे दोनों (अन्धसी) दिव्य हैं अर्थात् एक अभ्युदय और दूसरा निःश्रेयस, (सा) वह ब्रह्मविद्या (नः) हमारी (बोध्यवित्री) बोधन करनेवाली है, (मघोनां) ऐश्वर्य्य में से सर्वोपरि ऐश्वर्य्य (राधः) जो धनरूप है, हे विद्ये ! तू वह (चोद) हमको दे ॥२॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

वेद स्वाध्याय

Word-Meaning: - पदार्थ- (यत्) = जिस (ते) = तेरे (महिना) = सामर्थ्य से (पूरवः) = मनुष्य (उभे) = दोनों को (अधि क्षियन्ति) = प्राप्त करते हैं हे (शुभ्रे) = उज्ज्वल रूपवाली सरस्वति ! ज्ञानमयी ! (सा) = वह तू (मरुत्सखा) = विद्वानों की मित्र (अवित्री) = संसार की रक्षक होकर (नः बोधि) = हमें ज्ञान दे और (मघोनां) = ऐश्वर्यवान् जनों को (राधः चोद) = धनादि दे।
Connotation: - भावार्थ- वेदवाणी के स्वाध्याय से मनुष्य विद्वानों के संसर्ग में आकर ज्ञान तथा ऐश्वर्य को प्राप्त करे। ज्ञान प्राप्त करके ईश्वर की प्राप्ति भी करे।

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (शुभ्रे) हे शुद्धे ! (पूरवः) मनुष्याः त्वत्तः (उभे) द्वे फले लभन्ते (यत्, ते) ये फले ते (अन्धसी) दिव्ये स्तः अभ्युदयनिःश्रेयाख्ये च (सा) सा ब्रह्मविद्या (नः) अस्माकं (बोध्यवित्री) बोधनकर्त्री भवति (मघोनाम्) ऐश्वर्याणां सर्वोपरि (राधः) यद्धनमस्ति, हे विद्ये ! (चोद) तन्मह्यं प्रयच्छ। (मरुत्सखा) त्वं ज्ञानाधारोऽसि (महिना, अधिक्षियन्ति) तव महिम्ना तत्र ज्ञाने ते भक्ता निवसन्ति ॥२॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O divine stream of crystalline power and purity, by the grandeur of your light of knowledge devoted celebrants of all time receive both material nourishment and spiritual enlightenment, and thereby achieve both worldly honour and ultimate freedom. O saving spirit, protective mother, companion of the vibrations of divinity, awaken us and inspire in us the power and potential of eternal wealth and grandeur implicit in us and raise it to realisation and perfection.