Go To Mantra
Viewed 416 times

आ॒त्मा ते॒ वातो॒ रज॒ आ न॑वीनोत्प॒शुर्न भूर्णि॒र्यव॑से सस॒वान् । अ॒न्तर्म॒ही बृ॑ह॒ती रोद॑सी॒मे विश्वा॑ ते॒ धाम॑ वरुण प्रि॒याणि॑ ॥

English Transliteration

ātmā te vāto raja ā navīnot paśur na bhūrṇir yavase sasavān | antar mahī bṛhatī rodasīme viśvā te dhāma varuṇa priyāṇi ||

Mantra Audio
Pad Path

आ॒त्मा । ते॒ । वातः॑ । रजः॑ । आ । न॒वी॒नो॒त् । प॒शुः । न । भूर्णिः॑ । यव॑से । स॒स॒ऽवान् । अ॒न्तः । म॒ही इति॑ । बृ॒ह॒ती इति॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । इ॒मे इति॑ । विश्वा॑ । ते॒ । धाम॑ । व॒रु॒ण॒ । प्रि॒याणि॑ ॥ ७.८७.२

Rigveda » Mandal:7» Sukta:87» Mantra:2 | Ashtak:5» Adhyay:6» Varga:9» Mantra:2 | Mandal:7» Anuvak:5» Mantra:2


ARYAMUNI

Word-Meaning: - (वरुण) हे वरुणरूप परमात्मन् ! (वातः) वायु (ते) तुम्हारा (आत्मा) आत्मवत् है, आप ही (रजः) जलों को (आ) भले प्रकार (नवीनोत्) नवीन भावों द्वारा प्रेरित करते हैं। (न) जिस प्रकार (यवसे) तृणादिकों से (पशुः) पशु (ससवान्) सम्पन्न होता है, इसी प्रकार प्राणरूप वायु सब जीवों का (भूर्णिः) पोषक होता है। (बृहती मही) इस बड़ी पृथिवी और (रोदसी) द्युलोक के (अन्तः) मध्य में (इमे, विश्वा) यह सब विश्व (ते) तुम्हारे (धाम) स्थान हैं, जो (प्रियाणि) सब जीवों को प्रिय हैं ॥२॥
Connotation: - “वृणोति सर्वमिति वरुणः”=जो इस चराचर ब्रह्माण्ड को अपनी शक्तिद्वारा आच्छादान करे, उसका नाम “वरुण” है। एकमात्र परमात्मा ही ऐसा महान् है, जो सब विश्ववर्ग को अपनी शक्तिद्वारा आच्छादन करके अपनी महत्ता से सर्वत्र ओत-प्रोत हो रहा है, इसलिए उसका नाम वरुण है, जैसा कि “ईशावास्यमिदं  सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्” यजु० ४०।१॥ इत्यादि मन्त्रों में अन्यत्र भी वर्णन किया है कि इस संसार में जो कुछ वस्तुमात्र दृष्टिगत हो रहा है, वह सब ईश्वर की सत्ता से व्याप्त है। यही भाव इस मन्त्र में प्रकारान्तर से वर्णन किया है कि वायु उस वरुण परमात्मा के प्राणसमान और यह निखिल ब्रहमाण्ड उसके स्थान हैं, जो जीवमात्र को प्रिय हैं ॥ तात्पर्य्य यह है कि परमात्मा की रचनारूप ये ब्रह्माण्ड ऐसे अद्भुत हैं कि जीवमात्र इनको अमृततुल्य मानते हुए आनन्दपूर्वक उपभोग करते हैं, परन्तु जो प्राणी उस परब्रह्म के आज्ञापालक हैं, उन्हीं को यह ब्रह्माण्ड सदैव अमृतमय प्रतीत होता है, इसी अभिप्राय से कहा है कि “आनन्दादेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन जातानि जीवन्ति” उसी आनन्दस्वरूप परमात्मा से ये सब प्राणी उत्पन्न होते और आनन्द से ही जीते हैं। अर्थात् जिस प्रकार सुषुप्ति अवस्था में जीव आनन्द का भोक्ता होता है, इसी प्रकार प्रलयावस्था में भी आनन्द का भोग करता है, इसका नाम प्रकृतिलय अवस्था है। इसमें और मुक्ति अवस्था में इतना भेद है कि इस अवस्था में आविद्यिक=अविद्या की वृत्ति बनी रहती है और मुक्ति अवस्था में यह वृत्ति नहीं होती। यद्यपि प्रलय और सुषुप्ति में आनन्द होता है, परन्तु वह मुक्ति के समान अविद्यारहित आनन्द नहीं होता। “आनन्दादेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते०” मुक्त जीव आनन्द भोगते हुए ही इस संसार में आते और सदाचारी होने के कारण यहाँ भी आनन्द भोगते और अन्त में उसी चिद्घन आनन्दस्वरूप ब्रह्म में लय हो जाते हैं। इस प्रकार सदाचारपूर्वक परमात्मा की आज्ञापालन करनेवाले पुरुषों को यह संसार सदैव आनन्दमय होता है ॥२॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

व्यापक परमेश्वर

Word-Meaning: - पदार्थ-हे (वरुण) = सर्वव्यापक प्रभो !( वातः रजः) = जैसे वायु धूलि को (आ नवीनोत्) = सब तरफ उड़ाता है वैसे ही (वातः) = बलशाली (ते आत्मा) = तेरा व्यापक सामर्थ्य (रजः) = ब्रह्माण्डों में फैले, धूलि-कणवत् लोकों को (आ नवीनोत्) = सञ्चालित करता है। अध्यात्म में- (ते आत्मा वातः) = तेरा आत्मा, जीवभूत प्राण देह में (रजः आ नवीनोत्) = रक्तप्रवाह को प्रेरित करता है । (यवसे पशुः न ससवान् भूर्णि:) =घास, भूसा आदि पर पलनेवाला पशु जैसे अन्नादि से लादा जाकर स्वामी के भरण-पोषण में समर्थ होता है वैसे ही यह (वातः) = वायु (वा ते आत्मा) = तेरा महान् सामर्थ्य ही (ससवान्) = अन्नादि ऐश्वर्य से समृद्ध होकर (भूर्णि:) = विश्व के भरण-पोषण में समर्थ होता है । (इमे बृहती मही रोदसी अन्तः) = इन विशाल, सुख देनेवाले आकाश - भूमि या सूर्य-भूमि के बीच (ते) = तेरे (विश्वा) = समस्त (प्रियाणि) = प्रिय (धाम) = तेज और विश्वधारक लोक, सामर्थ्य हैं।
Connotation: - भावार्थ-समस्त लोक-लोकान्तरों का सञ्चालन ईश्वर अपनी परमेश्वरी शक्ति से कर रहा है। विश्व का भरण-पोषण भी वही करता है। उसीका तेज सूर्य आदि में चमक रहा है। यह सब उसकी व्यापकता से ही सम्भव है।

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (वरुण) हे वरुणरूपपरमात्मन् ! (वातः) वायुः (ते) तव (आत्मा) आत्मस्वरूपोऽस्ति तथा त्वमेव (रजः) जलं (आ) सम्यक् (नवीनोत्) नवीनभावेन प्रेरयसि (न) यथा (यवसे) तृणादिना (पशुः) पशुः गवादिः (ससवान्) समृद्धो भवति, तथैव प्राणात्मको वायुः सर्वेषां जन्तूनां (भूर्णिः) पोषकः, (बृहती, मही) अनयोरतिदीर्घयोः (रोदसी) द्यावापृथिव्योः (अन्तः) मध्ये (इमे, विश्वा) सर्व इमे लोकाः (ते) तव (धाम) प्रतिष्ठास्थानानि सन्ति, ये (प्रियाणि) सर्वजीवप्रियाः सन्ति ॥२॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Your spirit, O Varuna, sets the currents of energy in motion like winds and energises the cosmic particles anew, once asleep all, now rushing restless for food for existence like a horse moving for grass. O lord immanent and transcendent, all this great expansive universe of heaven and earth, all these abodes of existence, are homes of life dear to you, dear to the living forms.