द॒श॒स्यन्तो॑ नो म॒रुतो॑ मृळन्तु वरिव॒स्यन्तो॒ रोद॑सी सु॒मेके॑। आ॒रे गो॒हा नृ॒हा व॒धो वो॑ अस्तु सु॒म्नेभि॑र॒स्मे व॑सवो नमध्वम् ॥१७॥
daśasyanto no maruto mṛḻantu varivasyanto rodasī sumeke | āre gohā nṛhā vadho vo astu sumnebhir asme vasavo namadhvam ||
द॒श॒स्यन्तः॑। नः॒। म॒रुतः॑। मृ॒ळ॒न्तु॒। व॒रि॒व॒स्यन्तः॑। रोद॑सी॒ इति॑। सु॒मेके॒ इति॑ सु॒ऽमेके॑। आ॒रे। गो॒ऽहा। नृ॒ऽहा। व॒धः। वः॒। अ॒स्तु॒। सु॒म्नेभिः॑। अ॒स्मे इति॑। व॒स॒वः॒। न॒म॒ध्व॒म् ॥१७॥
SWAMI DAYANAND SARSWATI
फिर कौन राजजन श्रेष्ठ हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
मातृ-पितृ भक्त
SWAMI DAYANAND SARSWATI
पुनः के राजजनाः श्रेष्ठाः सन्तीत्याह ॥
हे वीरा मरुत इव ! दशस्यन्तस्सुमेके रोदसी वरिवस्यन्तो नो मृळन्तु वो युष्माकमारे गोहा नृहा वधोऽस्तु वसवो यूयं सुम्नेभिरस्मे नमध्वम् ॥१७॥
DR. TULSI RAM
MATA SAVITA JOSHI
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