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ऋभु॑क्षणो वाजा मा॒दय॑ध्वम॒स्मे न॑रो मघवानः सु॒तस्य॑। आ वो॒ऽर्वाचः॒ क्रत॑वो॒ न या॒तां विभ्वो॒ रथं॒ नर्यं॑ वर्तयन्तु ॥१॥

English Transliteration

ṛbhukṣaṇo vājā mādayadhvam asme naro maghavānaḥ sutasya | ā vo rvācaḥ kratavo na yātāṁ vibhvo rathaṁ naryaṁ vartayantu ||

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Pad Path

ऋभु॑ऽक्षणः। वा॒जाः॒। मा॒दय॑ध्वम्। अ॒स्मे इति॑। न॒रः॒। म॒घ॒ऽवा॒नः॒। सु॒तस्य॑। आ। वः॒। अ॒र्वाचः॑। क्रत॑वः। न। या॒ताम्। विऽभ्वः॑। रथ॑म्। नर्य॑म्। व॒र्त॒य॒न्तु॒ ॥१॥

Rigveda » Mandal:7» Sukta:48» Mantra:1 | Ashtak:5» Adhyay:4» Varga:15» Mantra:1 | Mandal:7» Anuvak:3» Mantra:1


SWAMI DAYANAND SARSWATI

अब चार ऋचावाले अड़तालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे (ऋभुक्षणः) महात्मा (मघवानः) बहुत उत्तम धनयुक्त (विभ्वः) सकल विद्याओं में व्याप्त (अर्वाचः) जो पीछे जानेवाले (वाजाः) विज्ञानवान् (नरः) मनुष्यो ! तुम (क्रतवः) अतीव बुद्धियों के (न) समान (सुतस्य) उत्पन्न हुए के सेवने से (अस्मे) हम लोगों को (मादयध्वम्) आनन्दित करो (आ, याताम्) आते हुए (वः) तुम लोगों के और हमारे (नर्यम्) मनुष्यों में उत्तम (रथम्) रमणीय यान को और नर (वर्तयन्तु) वर्तें ॥१॥
Connotation: - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जो विद्वान् जन तुम्हें और हमें विद्या और बुद्धि के दान से वा शिल्पविद्या से आनन्दित करते हैं, वे सर्वदा प्रशंसा करने योग्य हैं ॥१॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

आवागमन के साधन

Word-Meaning: - पदार्थ - हे (ऋभुक्षण:) = ऐश्वर्य सेवनकर्ता पुरुषो! हे (वाजा:) = ज्ञानी पुरुषो! हे (मघवानः) = धनों के स्वामी जनो! हे (नरः) = नायको! आप (सुतस्य) = उत्पन्न ऐश्वर्य से (अस्मे) = हमें (मादयध्वम्) = सुखी करो। (वः) = आप में से (अर्वाचः) = नये-नये (क्रतवः न विभ्वः) = बुद्धिमान् एवं सामर्थ्यवान् पुरुष (यातां) = यात्री जनों के लिये (नर्थ रथं) = मनुष्यों को सुखदायी रथ (वर्त्तयन्तु) = चलाया करें।
Connotation: - भावार्थ- राष्ट्र के प्रतिभाशाली ज्ञानी पुरुष धनवान् लोगों के सहयोग से अपनी बुद्धि द्वारा राष्ट्र में आवागमन के साधनों का विकास करें जिससे यात्री तथा व्यापारियों को सुविधा होवे और राष्ट्र समृद्ध बने।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

अथ विद्वद्भिः किं कर्तव्यमित्याह ॥

Anvay:

हे ऋभुक्षणो मघवानो विभ्वोऽर्वाचो वाजा नरो ! यूयं क्रतवो न सुतस्य सेवनेनास्मे मादयध्वमायातां वो युष्माकं अस्माकं च नर्यं रथमन्ये वर्तयन्तु ॥१॥

Word-Meaning: - (ऋभुक्षणः) महान्तः। ऋभुक्षा इति महन्नाम। (निघं०३.३)। (वाजाः) विज्ञानवन्तः (मादयध्वम्) आनन्दयत (अस्मे) अस्मान् (नरः) नायकाः (मघवानः) बहूत्तमधनयुक्ताः (सुतस्य) निष्पन्नस्य (आ) (वः) युष्माकम् (अर्वाचः) येऽर्वाग्गच्छन्ति ते (क्रतवः) प्रजाः (न) इव (याताम्) गच्छताम् (विभ्वः) सकलविद्यासु व्यापिनः (रथम्) रमणीयम् यानम् (नर्यम्) नृषु साधुम् (वर्त्तयन्तु) ॥१॥
Connotation: - अत्रोपमालङ्कारः । हे मनुष्या ! ये विद्वांसो युष्मानस्मांश्च विद्याबुद्धिप्रदानेन शिल्पविद्यया चानन्दयन्ति ते सर्वदा प्रशंसनीयाः सन्ति ॥१॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O great scientists, leaders of humanity commanding power and excellence, rejoice and let us rejoice in the excellence of our science, power and culture. Come to us and let the Kratus, expert workers of holy will and resolution, as the Vibhus, artists and technologists, turn your chariot worthy of the human nation towards us.

MATA SAVITA JOSHI

या सूक्ताच्या अर्थाची या पूर्वीच्या सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात उपमालंकार आहे. हे माणसांनो ! जे विद्वान तुम्हाला व आम्हाला विद्या व बुद्धी तसेच शिल्पविद्येने आनंदित करतात ते सदैव प्रशंसनीय असतात. ॥ १ ॥