कृ॒धि रत्नं॒ यज॑मानाय सुक्रतो॒ त्वं हि र॑त्न॒धा असि॑। आ न॑ ऋ॒ते शि॑शीहि॒ विश्व॑मृ॒त्विजं॑ सु॒शंसो॒ यश्च॒ दक्ष॑ते ॥६॥
kṛdhi ratnaṁ yajamānāya sukrato tvaṁ hi ratnadhā asi | ā na ṛte śiśīhi viśvam ṛtvijaṁ suśaṁso yaś ca dakṣate ||
कृ॒धि। रत्न॑म्। यज॑मानाय। सु॒क्र॒तो॒ इति॑ सुऽक्रतो। त्वम्। हि। र॒त्न॒ऽधाः। असि॑। आ। नः॒। ऋ॒ते। शि॒शी॒हि॒। विश्व॑म्। ऋ॒त्विज॑म्। सु॒ऽशंसः॑। यः। च॒। दक्ष॑ते ॥६॥
SWAMI DAYANAND SARSWATI
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
ऋत्विजों का तीक्ष्णीकरण
SWAMI DAYANAND SARSWATI
पुनः स राजा किं कुर्यादित्याह ॥
हे सुक्रतो ! यः सुशंसो दक्षते तं विश्वमृत्विजं नोऽस्मांश्चर्ते त्वमा शिशीहि। हि यतस्त्वं रत्नधा असि तस्माद्यजमानाय रत्नं कृधि ॥६॥
DR. TULSI RAM
MATA SAVITA JOSHI
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