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स रे॑तो॒धा वृ॑ष॒भः शश्व॑तीनां॒ तस्मि॑न्ना॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च । तन्म॑ ऋ॒तं पा॑तु श॒तशा॑रदाय यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒: सदा॑ नः ॥

English Transliteration

sa retodhā vṛṣabhaḥ śaśvatīnāṁ tasminn ātmā jagatas tasthuṣaś ca | tan ma ṛtam pātu śataśāradāya yūyam pāta svastibhiḥ sadā naḥ ||

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Pad Path

सः । रे॒तः॒ऽधाः । वृ॒ष॒भः । शश्व॑तीनाम् । तस्मि॑न् । आ॒त्मा । जग॑तः । तु॒स्थुषः॑ । च॒ । तत् । मा॒ । ऋ॒तम् । पा॒तु॒ । श॒तऽशा॑रदाय । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥ ७.१०१.६

Rigveda » Mandal:7» Sukta:101» Mantra:6 | Ashtak:5» Adhyay:7» Varga:1» Mantra:6 | Mandal:7» Anuvak:6» Mantra:6


ARYAMUNI

Word-Meaning: - (सः) वह परमात्मा (रेतोधाः) प्रकृतिरूप बीज के धारण करनेवाला है, (शश्वतीनाम्) अनन्त प्रजाओं में (वृषभः) वर्षिता (निरु. १, ८) सुख की वृष्टि करनेवाला है, (तस्मिन्) उसी परमात्मा में (जगतः, तस्थुषः, च) स्थावर और जङ्गम संसार के सब जीव विराजमान हैं, (तत्) वह ब्रह्म (शतशारदाय) सैकड़ों वर्षों तक (मा) हमारी (ऋतम्) सच्चाई की (पातु) रक्षा करे, हे परमात्मन् ! (यूयम्) आप (स्वस्तिभिः) मङ्गल कार्यों द्वारा (सदा) सदैव (नः) हमारी (पात) रक्षा करें ॥६॥
Connotation: - जिस परमात्मा में चराचर सब जीव निवास करते हैं और जो प्रकृतिरूपी बीजकोष धारण किये हुए है, अर्थात् जिससे तीनों गुणों की साम्यावस्थारूप प्रकृति और जीवरूप प्रकृति सदा भिन्न होकर विराजमान हैं, उसी एकमात्र परमात्मा से अपने सदाचार और सत्यता की प्रार्थना करनी चाहिये ॥६॥ यह १०१वाँ सूक्त और पहला वर्ग समाप्त हुआ ॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

ज्ञानमय परमेश्वर

Word-Meaning: - पदार्थ- (सः) = वह परमेश्वर (रेतोधाः) = प्रकृति देवी में विश्व के उत्पादक परम बीज, तेज को आधान करनेवाला (शश्वतीनां वृषभः) = मेघ तुल्य सुखों का वर्षक, गौओं में साण्ड के समान पृथिवियों में जीवों का बीज बोनेवाला है, (तिस्मन्) = उसके ही आश्रय (जगतः तस्थुषः च आत्मा) = जंगम और स्थावर संसार का आत्मा या सत्ता विद्यमान है। (तत् ऋतं) = वह ज्ञानमय परमेश्वर (मे शतशारदाय पातु) = मेरे जीवन को सौ वर्षों तक पालन करे। हे विद्वान् पुरुषो! (यूयं स्वस्तिभिः नः सदा पात) = आप सदैव ही उत्तम साधनों से हमारी रक्षा करें।
Connotation: - भावार्थ- वह परमात्मा प्रकृति में अपना तेज भरकर सृष्टि के योग्य बनाता है। जीवों के बीज=वीर्य के परमाणु पृथिवी में भरता है। जड़ और चेतन समस्त सृष्टि का आश्रय है। उस ज्ञानमय परमेश्वर से सौ वर्ष तक जीवन धारण करने का सामर्थ्य प्राप्त करो। अग्रिम सूक्त के ऋषि देवता यही हैं ।

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (सः) स परमात्मा (रेतोधाः) प्रकृतिरूपबीजस्य धाता तथा (शश्वतीनाम्) अनन्तासु प्रजासु (वृषभः) वर्षिता सुखानां (तस्मिन्) तस्मिन्नेव परमात्मनि (जगतः, तस्थुषश्च) स्थावरा जङ्गमाश्च जीवा वर्तन्ते (तत्) स ईश्वरः (शतशारदाय) वर्षशतपर्यन्तं (मा) मम (ऋतम्) सत्यं (पातु) रक्षतु, हे परमात्मन्, (यूयम्) भवान् (स्वस्तिभिः) मङ्गलवाग्भिः (सदा) शश्वत् (नः) अस्मान् (पात) रक्षतु ॥६॥इत्येकोत्तरशततमं सूक्तं प्रथमो वर्गश्च समाप्तः ॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - That lord is the infinite reservoir of the seeds of existence, mighty abundant and generous, from whom flows the eternal cycle of life. Therein abides the very soul of existence in motion and stabilised in motion. May the lord sustain, protect and promote the abundant flow of truthful life in action for me for a full span of hundred years. O lord, O clouds, O showers of rain, protect and promote us by all modes and means of happiness and well being all round all ways all time.