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मा शूने॑ अग्ने॒ नि ष॑दाम नृ॒णां माशेष॑सो॒ऽवीर॑ता॒ परि॑ त्वा। प्र॒जाव॑तीषु॒ दुर्या॑सु दुर्य ॥११॥

English Transliteration

mā śūne agne ni ṣadāma nṛṇām māśeṣaso vīratā pari tvā | prajāvatīṣu duryāsu durya ||

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Pad Path

मा। शूने॑। अ॒ग्ने॒। नि। स॒दा॒म॒। नृ॒णाम्। मा। अ॒शेष॑सः। अ॒वीर॑ता। परि॑। त्वा॒। प्र॒जाऽव॑तीषु। दुर्या॑सु। दु॒र्य॒ ॥११॥

Rigveda » Mandal:7» Sukta:1» Mantra:11 | Ashtak:5» Adhyay:1» Varga:25» Mantra:1 | Mandal:7» Anuvak:1» Mantra:11


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर ये राजादि क्या न करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्विन् ! जो (अवीरता) वीरों का अभाव है उससे (नृणाम्) नायकों में (मा, निषदाम) निरन्तर स्थित न हों (शूने) शीघ्रकारिणी सेना में (अशेषसः) सम्पूर्ण हम (त्वा) तेरे (मा) न (परि) सब ओर से निरन्तर स्थित हों। हे (दुर्य्य) घरों में वर्त्तमान ! जिस कारण (प्रजावतीषु) प्रशस्त सन्तानों से युक्त (दुर्यासु) घरों में हुई रीतियों में सुखपूर्वक निरन्तर स्थित हों, वैसा कीजिये ॥११॥
Connotation: - हे क्षत्रिय-कुल में हुए राजपुरुषो ! तुम कातर मत होओ। विरोध से परस्पर युद्ध करके निःशेष मत होओ। सनातन राजनीति से प्रजाओं का पालन कर कीर्त्तिवाले होओ ॥११॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनरेते राजादयः किं न कुर्य्युरित्याह ॥

Anvay:

हे अग्ने ! याऽवीरता तथा नृणां मध्ये मा निषदाम शूने सैन्येऽशेषसः त्वा मा परि नि षदाम। हे दुर्य ! यतः प्रजावतीषु दुर्यासु सुखेन नि षदाम तथा विधेहि ॥११॥

Word-Meaning: - (मा) निषेधे (शूने) शूः सद्यः करणं विद्यते यस्मिँस्तस्मिन् सैन्ये। अत्र शू इति क्षिप्रनाम। (निघं०२.१५) तस्मात्पामादित्वान्मत्वर्थीयो नः प्रत्ययः। (अग्ने) पावक इव तेजस्विन् (नि) नितराम् (सदाम) सीदेम (नृणाम्) नायकानाम् (मा) (अशेषसः) निःशेषाः (अवीरता) वीरभावरहितता (परि) (त्वा) त्वाम् (प्रजावतीषु) प्रशस्तप्रजायुक्तासु (दुर्यासु) गृहेषु भवासु रीतिषु (दुर्य्य) गृहेषु वर्त्तमान ॥११॥
Connotation: - हे क्षत्रियकुलोद्भवा राजपुरुषा यूयं कातरा मा भवत विरोधेन परस्परेण सहयुध्वा निःशेषा मा सन्तु सनातन्या राजनीत्या प्रजाः पालयित्वा यशस्विनो भवत ॥११॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - हे क्षत्रिय कुलोत्पन्न राजपुरुषांनो ! तुम्ही भयभीत होऊ नका, विरोधाने परस्पर युद्ध करून निःशेष होऊ नका, सनातन राजनीतीने प्रजेचे पालन करून कीर्ती मिळवा. ॥ ११ ॥