Go To Mantra
Viewed 446 times

यो नः॒ स्वो अर॑णो॒ यश्च॒ निष्ट्यो॒ जिघां॑सति। दे॒वास्तं सर्वे॑ धूर्वन्तु॒ ब्रह्म॒ वर्म॒ ममान्त॑रम् ॥१९॥

English Transliteration

yo naḥ svo araṇo yaś ca niṣṭyo jighāṁsati | devās taṁ sarve dhūrvantu brahma varma mamāntaram ||

Mantra Audio
Pad Path

यः। नः॒। स्वः। अर॑णः। यः। च॒। निष्ट्यः॑। जिघां॑सति। दे॒वाः। तम्। सर्वे॑। धू॒र्व॒न्तु॒। ब्रह्म॑। वर्म॑। मम॑। अन्त॑रम् ॥१९॥

Rigveda » Mandal:6» Sukta:75» Mantra:19 | Ashtak:5» Adhyay:1» Varga:22» Mantra:4 | Mandal:6» Anuvak:6» Mantra:19


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर सेनाध्यक्ष सङ्ग्राम में क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे सेनापति ! (यः) जो (नः) हमारे (स्वः) अपना (अरणः) सङ्ग्राम रहित यथावत् सङ्ग्राम नहीं करता (यः, च) और जो (निष्ट्यः) शब्द से ढिठाई कराने योग्य दूरस्थ होते हुए तथा अपनी सेना को (जिघांसति) मारने की इच्छा करता है (तम्) उसको (सर्वे) सब (देवाः) विद्वान् जन (धूर्वन्तु) मारें तथा (मम) मेरा (अन्तरम्) समीप में रमता हुआ (ब्रह्म) सर्वव्यापक चेतन (वर्म) कवच के समान रक्षा करनेवाला हो ॥१९॥
Connotation: - सेनापति के जो अपने भृत्य उत्साह से युद्ध न करें और जो अपने नौकरों के मारने की इच्छा करें, उन सब को विद्वान् और अधीश शीघ्र मारें तथा युद्ध के समय सब वीर परमेश्वर ही को अपना रक्षा करनेवाला जानें ॥१९॥ इस सूक्त में वर्म अर्थात् कवच बख्तर आदि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह श्रीमान् परमहंसपरिव्राजकाचार्य्य परमविद्वान् श्रीमद्विरजानन्दसरस्वती स्वामीजी के शिष्य श्रीमान् दयानन्दसरस्वतीस्वामी जी के बनाये हुए संस्कृत और आर्यभाषा से सुभूषित अच्छे-अच्छे प्रमाणों से युक्त, ऋग्वेदभाष्य के छठे मण्डल में छठा अनुवाक और पचहत्तरवाँ सूक्त और छठा मण्डल भी तथा पञ्चमाष्टक के प्रथमाध्याय में बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

ब्रह्म वर्म मम अन्तरम्

Word-Meaning: - [१] (यः) = जो (स्वः) = अपना, कोई रिश्तेदार, बन्धु-बान्धव अथवा (अरण:) = [अरममाण] हमारे साथ न प्रीतिवाला कोई पराया व्यक्ति (यः च) = और जो (निष्ट्य:) = तिरोभूत-दूरे स्थित पुरुष (नः) = हमें (जिघांसति) = मारना चाहता है। (तम्) = उसको (सर्वे देवा:) = सब देव (धूर्वन्तु) = हिंसित करें। जल, वायु आदि देवों की प्रतिकूलता से वह विनष्ट हो जाये । अथवा हमारे दिव्य भाव उसकी पापवृत्ति को समाप्त करनेवाले हों। [२] (ब्रह्म) = ज्ञान अथवा प्रभु (मम) = मेरे (अन्तरं वर्म) = अन्दर के कवच हों। इस अन्तः कवच से सुरक्षित हुआ मैं हिंसित होऊँ ।
Connotation: - भावार्थ- हृदयस्थ प्रभु व ज्ञान को ही हम अपना अन्दर का कवच बनायें और हिंसित न सर्वे हों।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनः सेनाध्यक्षाः संग्रामे किं कुर्य्युरित्याह ॥

Anvay:

हे सेनापते ! यो नः स्वोऽरणो यश्च निष्ट्यः स्वकीयं सैन्यं जिघांसति तं सर्वे देवा धूर्वन्तु ममान्तरं ब्रह्म वर्म्मेव रक्षकं भवतु ॥१९॥

Word-Meaning: - (यः) (नः) अस्माकम् (स्वः) स्वकीयः (अरणः) सङ्ग्रामरहितो यथावत्सङ्ग्रामं न करोति (यः) (च) (निष्ट्यः) शब्देन धर्षितुं योग्यो दूरस्थः सन् (जिघांसति) हन्तुमिच्छति (देवाः) विद्वांसः (तम्) (सर्वे) (धूर्वन्तु) हिंसन्तु (ब्रह्म) सर्वव्यापकं चेतनम् (वर्म) वर्म्मेव रक्षकम् (मम) (अन्तरम्) यदन्ते समीपे रमते तत् ॥१९॥
Connotation: - सेनापतेर्ये स्वभृत्या उत्साहेन न युध्येयुर्ये च स्वभृत्यान् जिघांसन्ति तान् सर्वान् विद्वांसोऽध्यक्षाश्च सद्यो घ्नन्तु तथा युद्धसमये सर्वे वीराः परमेश्वरमेव स्वरक्षकं विजानन्त्विति ॥१९॥ अत्र वर्मादिगुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य्याणां परमविदुषां श्रीमद्विरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिना विरचिते संस्कृतार्यभाषाविभूषिते सुप्रमाणयुक्त ऋग्वेदभाष्ये षष्ठे मण्डले षष्ठोऽनुवाकः पञ्चसप्ततितमं सूक्तं षष्ठं मण्डलं च पञ्चमाष्टके प्रथमेऽध्याये द्वाविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Any one, whether our own or a stranger far away non-fighting, or far off and low, that hurts and violates us deserves that the best and enlightened of the nation punish him to nullity. For me, the Lord Almighty and the divine knowledge and awareness within me is my best armour for protection.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

What should the commanders do in the battlefield—is told.

Anvay:

O Commander of the army! who-so- ever would try to kill our army, whether he be a stranger or one of us, who does not fight properly or zealously, may all enlightened persons discomfit him. May God be my closest Armor or Defense.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - The chiefs should slay, those servants of the Commander of the army, who do not fight well or desire to kill their own servants. At the time of the battle, all brave persons should know God to be their Protector.
Footnote: Here ends Sixth Mandala of Rishi Dayanand Saraswati's Commentary of the Rigveda Samhita translated by Swami Dharamananda Saraswati and edited by Pt. Brahm Dutt Snatak and Surendra Kumar Hindi.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - जे उत्साहाने युद्ध करीत नाहीत व आपल्या नोकरांना मारण्याची इच्छा बळगतात त्या सर्वांना (सेनापतीने) विद्वानांनी व राजाने शीघ्रतेने मारावे व युद्धाच्या वेळी सर्व वीरांनी परमेश्वरालाच आपला रक्षक मानवे. ॥ १९ ॥