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यो अ॑स्मै ह॒विषावि॑ध॒न्न तं पू॒षापि॑ मृष्यते। प्र॒थ॒मो वि॑न्दते॒ वसु॑ ॥४॥

English Transliteration

yo asmai haviṣāvidhan na tam pūṣāpi mṛṣyate | prathamo vindate vasu ||

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Pad Path

यः। अ॒स्मै॒। ह॒विषा। अवि॑धत्। न। तम्। पू॒षा। अपि॑। मृ॒ष्य॒ते॒। प्र॒थ॒मः। वि॒न्द॒ते॒। वसु॑ ॥४॥

Rigveda » Mandal:6» Sukta:54» Mantra:4 | Ashtak:4» Adhyay:8» Varga:19» Mantra:4 | Mandal:6» Anuvak:5» Mantra:4


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

कौन महान् श्रीमान् होता है, इस विषय को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे विद्वानो ! (यः) जो (हविषा) देने वा लेने से (अस्मै) इसके लिये (वसु) बहुत धन का (अविधत्) विधान करता है वा (प्रथमः) पहिला कारुक धन (विन्दते) पाता है (तम्) उसको (पूषा) पुष्टि करनेवाला (अपि) भी (न) नहीं (मृष्यते) सहता है ॥४॥
Connotation: - हे मनुष्यो ! जो पहिले से शिल्पविद्या को पाकर क्रिया से पदार्थों का निर्माण करता है, वह बहुत धन को प्राप्त होता है, उसके सदृश पुष्ट कोई नहीं होता है ॥४॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

प्रभु पूजन व अविनाश

Word-Meaning: - [१] (यः) = जो भी उपासक (अस्मै) = इस पोषक प्रभु के लिये (हविषा अविधत्) = दानपूर्वक अदन के द्वारा पूजन करता है, (तम्) = उसे (पूषा) = ये पोषक प्रभु (अपि) = [ईषद् अर्थे] थोड़ा भी (न मृष्यते) = हिंसित नहीं करते। दानपूर्वक अदन ही यज्ञ शेष का सेवन है। यह यज्ञशेष का सेवन ही मनुष्य को अमृतत्व प्राप्त कराता है । [२] यह यज्ञशेष का सेवन करनेवाला (प्रथमः) = प्रथम स्थान को प्राप्त करता है [प्रथ विस्तारे] खूब ही अपनी शक्तियों का विस्तार करनेवाला होता है। यह (वसु विन्दते) = निवास के लिये आवश्यक सब धनों को यह प्राप्त करता है।
Connotation: - भावार्थ- जब हम दानपूर्वक अदन करते हुए, सदा यज्ञशेष का सेवन करते हुए, प्रभु का पूजन करते हैं, तो हिंसित नहीं होते और सब वसुओं को प्राप्त करते हैं। वसुमान बनते हैं।
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

को महाञ्छ्रीमान् भवतीत्याह ॥

Anvay:

हे विद्वांसो ! यो हविषाऽस्मै वस्वविधत् प्रथमो वसु विन्दते तं पूषाऽपि न मृष्यते ॥४॥

Word-Meaning: - (यः) (अस्मै) (हविषा) दानेनादानेन वा (अविधत्) विदधाति (न) निषेधे (तम्) (पूषा) (अपि) (मृष्यते) सहते (प्रथमः) आदिमः शिल्पी (विन्दते) प्राप्नोति (वसु) बहुधनम् ॥४॥
Connotation: - हे मनुष्या ! यः प्रथमतः शिल्पविद्यां प्राप्य क्रियया पदार्थान् निर्मिमीते स पुष्कलां श्रियं प्राप्नोति तत्सदृशः पुष्टः कोऽपि न भवति ॥४॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Pusha, lord ruler and giver of nourishment and growth, does not hurt or challenge him who offers homage with creative and constructive projects in honour of him. Indeed, the first and original inventor and maker of basic things wins rewards of wealth for the invention.
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ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

Who become great and wealthy-is told.

Anvay:

O enlightened men! the nourishing king does not tolerate an artist (or any other person) who, by giving or taking unjustly becomes foremost and acquires much wealth. But he, who acquires wealth justly becomes unequalled.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - O men! that person, who gets the first hand knowledge of technology and none is equal to him in nourishment, growth and development.
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MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - हे माणसांनो ! जो प्रथम शिल्पविद्या प्राप्त करून पदार्थांची निर्मिती करतो त्याला खूप धन प्राप्त होते. त्याच्यासारखे समृद्ध कोणी नसते. ॥ ४ ॥