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क्रत्वा॒ हि द्रोणे॑ अ॒ज्यसेऽग्ने॑ वा॒जी न कृत्व्यः॑। परि॑ज्मेव स्व॒धा गयोऽत्यो॒ न ह्वा॒र्यः शिशुः॑ ॥८॥

English Transliteration

kratvā hi droṇe ajyase gne vājī na kṛtvyaḥ | parijmeva svadhā gayo tyo na hvāryaḥ śiśuḥ ||

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Pad Path

क्रत्वा॑। हि। द्रोणे॑। अ॒ज्यसे॑। अग्ने॑। वा॒जी। न। कृत्व्यः॑। परि॑ज्माऽइव। स्व॒धा। गयः॑। अत्यः॑। न। ह्वा॒र्यः। शिशुः॑ ॥८॥

Rigveda » Mandal:6» Sukta:2» Mantra:8 | Ashtak:4» Adhyay:5» Varga:2» Mantra:3 | Mandal:6» Anuvak:1» Mantra:8


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर विद्वान् को क्या करना चाहिये विषय को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान प्रतापी जन आप (हि) जिस कारण (क्रत्वा) बुद्धि वा कर्म से (वाजी) वेग से युक्त (न) जैसे वैसे (कृत्व्यः) करने योग्य कर्म्म को (परिज्मेव) सब ओर जानेवाला वह वायु (स्वधा) अन्न (गयः) गृह और (अत्यः) मार्ग को व्याप्त होनेवाला (न) जैसे वैसे (ह्वार्य्यः) कुटिल मार्ग में जाने योग्य (शिशुः) बालक (द्रोणे) जाने योग्य मार्ग में (अज्यसे) प्राप्त किये जाते हो, इस कारण से कृतकृत्य हो ॥८॥
Connotation: - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन सम्पूर्ण अज्ञ जनों के लिये बुद्धि देकर श्रेष्ठ मार्ग में प्राप्त कराते हैं और माता-पिता बालक को जैसे वैसे शिक्षा करते हैं, वे अन्न आदि से सत्कार करने योग्य होते हैं ॥८॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

क्रतुमयता व प्रभु प्राप्ति

Word-Meaning: - [१] (क्रत्वा) = यज्ञादि कर्मों से, संकल्प से व प्रज्ञान से (हि) = ही (द्रोणे) = इस शरीर रूप पात्र में (अज्यसे) = आप व्यक्त होते हैं। प्रभु का दर्शन इसी शरीर में होता है। होता तब है जब कि - [क] हमारे हाथ यज्ञादि उत्तम कर्मों में लगे हों, [ख] मन प्रभु प्राप्ति के प्रबल संकल्पवाला हो, [ग] और मस्तिष्क ज्ञान परिपूर्ण हो । हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! आप (वाजी न) = एक शक्तिशाली के समान (कृत्व्यः) = अपने कर्मों में कुशल व समर्थ हैं। आप अपनी सर्वशक्तिमत्ता से ही सृष्टि के निर्माण व धारण आदि कर्मों को करने में समर्थ हैं । [२] (परिज्मा इव) = इस परितः गन्ता वायु के समान (स्वधा) = सब जीवों के धारण करनेवाले हैं तथा (गयः) = उनके लिये घर के समान हैं। आप ही सबका वायुवत् धारण करते हैं । (अत्यः न) = निरन्तर गाँमी अश्व के समान आप (ह्वार्यः) = सब कुटिलताओं से हमें पार करनेवाले हैं और (शिशुः) = हमारी बुद्धियों को तीव्र करनेवाले हैं। वस्तुतः बुद्धि की तीव्रता के द्वारा ही आप हमें कुटिलताओं से पार करते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि हम क्रतुमय बनें। वे प्रभु सर्वशक्तिमान् जीवन के दाता व बुद्धि को तीव्र करनेवाले हैं।
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनर्विदुषा किं कर्त्तव्यमित्याह ॥

Anvay:

हे अग्ने ! त्वं हि क्रत्वा वाजी न कृत्व्यः परिज्मेव स्वधा गयोऽत्यो न ह्वार्यः शिशुर्द्रोणेऽज्यसे तस्मात् कृतकृत्योऽसि ॥८॥

Word-Meaning: - (क्रत्वा) प्रज्ञया कर्म्मणा वा (हि) यतः (द्रोणे) गन्तव्ये मार्गे (अज्यसे) गम्यसे (अग्ने) पावक इव वर्त्तमान (वाजी) वेगवान् (न) इव (कृत्व्यः) करणीयं कर्म्म। कृत्त्वीति कर्मनाम। (निघं०२.१) (परिज्मेव) यः परितः सर्वतो गच्छति स वायुः (स्वधा) अन्नम् (गयः) गृहम् (अत्यः) अतति व्याप्नोत्यध्वानम् (न) इव (ह्वार्य्यः) कुटिलं मार्गं गन्तुं योग्यः (शिशुः) बालकः ॥८॥
Connotation: - अत्रोपमालङ्कारः । ये विद्वांसः सर्वाज्ञजनेभ्यो बुद्धिं प्रदाय सन्मार्गं नयन्ति मातापितरौ बालमिव शिक्षयन्ति त अन्नादिना सत्कर्त्तव्या भवन्ति ॥८॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, holy light and fire, you manifest by attrition in the wood, by yajna in the home, active, sportive and restive like a courser, moving everywhere like wind, soothing and satisfying as food, intimate as self will, comfortable as home, vibrant as a wave of energy and pure and innocent as a baby.
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ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

What should an enlightened man do is told.

Anvay:

O learned person ! purifier like the fire, you go on your noble way like a rapid stead, and like wind moving everywhere discharging your duties quickly. You are like food and home, are innocent and beloved like a child walking here and there.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - Those enlightened persons who lead ignorant people to the path of righteousness by giving them true knowledge and teach them as the parents do to their children should be respected with food and other articles.
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MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जे विद्वान अज्ञ लोकांना बुद्धी प्रदान करून सन्मार्गाकडे नेतात, माता-पिता बालकांना जसे शिक्षण देतात तसे शिक्षण देतात त्यांचा अन्न इत्यादींनी सत्कार करावा. ॥ ८ ॥