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त्वं हि क्षैत॑व॒द्यशोऽग्ने॑ मि॒त्रो न पत्य॑से। त्वं वि॑चर्षणे॒ श्रवो॒ वसो॑ पु॒ष्टिं न पु॑ष्यसि ॥१॥

English Transliteration

tvaṁ hi kṣaitavad yaśo gne mitro na patyase | tvaṁ vicarṣaṇe śravo vaso puṣṭiṁ na puṣyasi ||

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Pad Path

त्वम्। हि। क्षैत॑ऽवत्। यशः॑। अग्ने॑। मि॒त्रः। न। पत्य॑से। त्वम्। वि॒ऽच॒र्ष॒णे॒। श्रवः॑। वसो॒ इति॑। पु॒ष्टिम्। न। पु॒ष्य॒सि॒ ॥१॥

Rigveda » Mandal:6» Sukta:2» Mantra:1 | Ashtak:4» Adhyay:5» Varga:1» Mantra:1 | Mandal:6» Anuvak:1» Mantra:1


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अभ पञ्चमाध्याय का आरम्भ है और छठे मण्डल में ग्यारह ऋचावाले दूसरे सूक्त का आरम्भ किया जाता है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्नि कैसा होता है, इस विषय को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे (विचर्षणे) प्रकाश करनेवाले (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान ! (हि) जिस कारण (त्वम्) आप (क्षैतवत्) पृथिवी में हुए के समान (यशः) धन अन्न वा कीर्त्ति को (मित्रः) मित्र (न) जैसे वैसे (पत्यसे) पति के सदृश आचरण करते हो और हे (वसो) वसानेवाले ! (त्वम्) आप (पुष्टिम्) धातु के साम्य से बल आदि के योग को (न) जैसे वैसे (श्रवः) अन्न वा श्रवण का (पुष्यसि) पालन करते हो, इससे सुखी होते हो ॥१॥
Connotation: - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पृथिवी में उत्पन्न हुए शुष्क वस्तु रस से रहित होते हैं, वैसे विद्यारहित और धर्म्मरहित जन दयारहित और कोमलतारहित होते हैं ॥ २ ॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'ज्ञान व शक्ति' का पोषण

Word-Meaning: - [१] हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (त्वम्) = आप (हि) = निश्चय से (क्षैतवत्) = [क्षि निवासगत्योः] उत्तम निवास व गतिवाले (यशः) = यश को (पत्यसे) = [अभिगमयसि] प्राप्त कराते हैं । (मित्रः न) = आप सूर्य के समान हैं। सूर्य के समान देदीप्यमान होते हुये आप हमें जीवन को उत्तमता से बितानेवाला व उत्तम कर्मोंवाला बनाकर बड़ा यशस्वी बनाते हैं । यह 'क्षैतवत् यश' आपकी कृपा से ही प्राप्त होता है। [२] हे (विचर्षणे) = विशिष्ट द्रष्टा सर्वज्ञ प्रभो ! हे वसो हमारे निवासों को उत्तम बनानेवाले प्रभो ! आप हमारे (श्रवः) = ज्ञानों को (पुष्टिं न) = पुष्टि के समान ही (पुष्यसि) = पुष्ट करते हैं । 'विचर्षणि' होते हुए आप हमारे मस्तिष्क को ज्ञान से पुष्ट करते हैं, और 'वसु' होते हुए आप हमें शरीर में उचित पोषण को प्राप्त कराते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु हमें उत्तम निवास व गतिवाले यशस्वी जीवन को प्राप्त कराते हैं। वे हमें 'ज्ञान व शक्ति' के पोषण से युक्त करते हैं। इसी से वे प्रभु 'विचर्षणि' हैं, वे 'वसु' हैं ।
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अथाग्निः कीदृशोऽस्तीत्याह ॥

Anvay:

हे विचर्षणेऽग्ने ! हि त्वं क्षैतवद्यशो मित्रो न पत्यसे। हे वसो ! त्वं पुष्टिं न श्रवः पुष्यसि तस्मात्सुखी भवसि ॥१॥

Word-Meaning: - (त्वम्) (हि) यतः (क्षैतवत्) क्षितौ भववत् (यशः) धनमन्नं कीर्तिं वा (अग्ने) पावक इव वर्त्तमान (मित्रः) सखा (न) इव (पत्यसे) पतिरिवाचरसि (त्वम्) (विचर्षणे) प्रकाशक (श्रवः) अन्नं श्रवणं वा (वसो) वासयितः (पुष्टिम्) धातुसाम्याद् बलादियोगम् (न) इव (पुष्यसि) ॥१॥
Connotation: - अत्रोपमालङ्कारः । यथा पार्थिवानि शुष्कानि वस्तूनि नीरसानि भवन्ति तथाऽविद्वांसोऽधार्मिका निष्ठुरा जायन्ते ॥१॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, leading light of life, like an inmate of our earthly home, like a friend for sure you protect, promote and sustain our honour and excellence. O watchful observer of all, our haven and home, you preserve and advance our food and energy, honour and fame, like our body’s vitality.
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ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

How is Agni is told.

Anvay:

O highly learned person! illuminator of truth and purifier like 'the fire', you are the master of wealth, food or glory like a friend. O Inhalator or support of all! you make increase fame like full prosperity. Therefore you are happy.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - As the earthly objects are dry and insipid, so those who are not learned become un-righteous and hard hearted (without feeling. Ed.).
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MATA SAVITA JOSHI

या सूक्तात अग्नी व विद्वानांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जशा पार्थिव शुष्क वस्तू रसहीन असतात तसे विद्यारहित व अधार्मिक लोक दयारहित व कोमलतारहित असतात. ॥ १ ॥